हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिरों में जमा दान राशि के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भक्तों द्वारा दिया गया दान भगवान का है, सरकार का नहीं। यह राशि अब सड़कों, पुलों या किसी निजी व्यवसाय में खर्च नहीं की जा सकेगी।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस राकेश कैंथला की बेंच ने कहा कि दान केवल धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए ही इस्तेमाल होना चाहिए। कोर्ट ने 31 क्षेत्रों की विस्तृत सूची जारी की है, जिनमें इन पैसों का उपयोग किया जा सकता है।
हिमाचल में सरकारी योजनाओं में खर्च हो रहा था मंदिर का धन
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— One India News (@oneindianewscom) October 15, 2025
दान का पैसा वेद-योग शिक्षा में होगा इस्तेमाल
कोर्ट ने कहा कि दान राशि का मुख्य उपयोग वेद और योग की शिक्षा, अध्ययन और प्रचार-प्रसार के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करने में होना चाहिए। इसके अलावा, मंदिरों की देखभाल, पुजारियों को वेतन देने और सामाजिक बुराइयों को खत्म करने में भी इसका उपयोग किया जाएगा। कोर्ट ने छुआछूत और जातिवाद खत्म करने के लिए अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों की शुरुआत करने का भी आदेश दिया।
गलत इस्तेमाल करने वालों से वसूली होगी
हाई कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन को सख्त निर्देश दिए हैं। अब हर मंदिर अपनी मासिक आय, खर्च और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से नोटिस बोर्ड या वेबसाइट पर प्रदर्शित करेगा, ताकि भक्तों का विश्वास बना रहे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि मंदिर के धन का गलत इस्तेमाल करना आपराधिक और धार्मिक स्वतंत्रता का अपमान होगा। यदि किसी ट्रस्ट ने धन का दुरुपयोग किया, तो पूरी राशि उसी से वसूल की जाएगी।
पहले कहां हो रहा था धन का इस्तेमाल
जानकारी के अनुसार, मंदिरों के दान का पैसा अब तक सड़कों और पुलों के निर्माण, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और सार्वजनिक भवनों के निर्माण जैसे गैर-धार्मिक कार्यों में लगाया जा रहा था। इसके अलावा, व्यक्तिगत लाभ, निजी उद्योगों में निवेश और मंदिर आने वाले वीआईपी के लिए महंगे उपहार (काजू, बादाम, मोमेंटो) खरीदने में भी धन खर्च किया जा रहा था। हाई कोर्ट ने इन सभी कामों पर तुरंत रोक लगा दी है।