इस बार गणतंत्र दिवस समारोह में एक अनोखा और भावनात्मक नजारा देखने को मिलेगा। पहली बार भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) का विशेष दस्ता डबल हंप बैक्ट्रियन ऊंट और ज़ांस्कर घोड़ों के साथ कर्तव्य पथ पर कदमताल करता नजर आएगा। ये पशु ईस्टर्न लद्दाख जैसे दुर्गम और अत्यधिक ठंडे इलाकों में सैनिकों के लिए जीवनरेखा साबित हो रहे हैं।
गणतंत्र दिवस 2026 की परेड में पहली बार ड्रोन गिराने के लिए प्रशिक्षित ईगल भी शामिल होंगे। इस बार कर्तव्य पथ पर सेना की ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि उन मूक साथियों से भी दिखाई देगी, जो कठिन परिस्थितियों में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सेवा करते हैं। यह पहली बार है जब सेना के पशु दस्ते इतने बड़े और संगठित रूप में परेड का हिस्सा बनेंगे।
इस विशेष दस्ते में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार ज़ांस्कर पोनी, चार शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), भारतीय नस्ल के 10 सैन्य कुत्ते और पहले से सेवा में मौजूद 6 पारंपरिक सैन्य कुत्ते शामिल होंगे। दस्ते की अगुवाई बैक्ट्रियन ऊंट करेंगे, जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया है।
#WATCH | Delhi | For the first time, a carefully curated animal contingent of the Remount & Veterinary Corps (RVC) of the Indian Army will be showcased during the Republic Day 2026 march along Kartavya Path.
The contingent will feature two Bactrian camels, four Zanskar ponies,… pic.twitter.com/31TD8DLc16
— ANI (@ANI) December 31, 2025
बैक्ट्रियन ऊंट अत्यधिक ठंडे मौसम और 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर भी आसानी से काम कर सकते हैं। ये 250 किलो तक का सामान ढोने में सक्षम होते हैं और बेहद कम पानी व चारे में लंबी दूरी तय कर लेते हैं। दुर्गम इलाकों में रसद और सैन्य सामग्री पहुंचाने में ये ऊंट सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
इनके बाद ज़ांस्कर पोनी कर्तव्य पथ पर नजर आएंगी। ये लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी नस्ल हैं। आकार में भले ही ये छोटी हों, लेकिन इनकी ताकत और सहनशक्ति असाधारण है। माइनस 40 डिग्री तापमान और अत्यधिक ऊंचाई पर ये 40 से 60 किलो वजन लेकर चल सकती हैं। वर्ष 2020 से ये सियाचिन जैसे कठिन क्षेत्रों में सैनिकों के साथ तैनात हैं और कई बार एक दिन में 70 किलोमीटर तक गश्त करती हैं।
परेड में शामिल चार शिकारी पक्षी सेना की आधुनिक और स्मार्ट रणनीति को दर्शाएंगे। इन पक्षियों का उपयोग निगरानी और हवाई सुरक्षा से जुड़े अभियानों में किया जाता है। ये विशेष रूप से ऐसे चील हैं जिन्हें दुश्मन के ड्रोन को पलभर में लपक कर गिराने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, जिससे सेना की सुरक्षा और निगरानी क्षमता और मजबूत होती है।
इस परेड का सबसे भावुक और प्रेरणादायक हिस्सा होंगे भारतीय सेना के कुत्ते, जिन्हें प्यार से ‘मूक योद्धा’ कहा जाता है। इन कुत्तों को मेरठ स्थित रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर सेंटर में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। ये आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटकों और बारूदी सुरंगों की पहचान, खोज-बचाव कार्यों और आपदा राहत अभियानों में सैनिकों के साथ काम करते हैं। कई मौकों पर इन कुत्तों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सैनिकों की जान बचाई है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब सेना मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी भारतीय नस्लों के कुत्तों को भी बड़े पैमाने पर शामिल कर रही है। यह भारत की स्वदेशी क्षमताओं पर बढ़ते भरोसे और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम है।
गणतंत्र दिवस 2026 पर जब ये पशु कर्तव्य पथ से गुजरेंगे, तो वे यह संदेश देंगे कि देश की रक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं होती। सियाचिन की बर्फीली चोटियों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान तक, इन मूक योद्धाओं ने चुपचाप लेकिन दृढ़ता के साथ अपना कर्तव्य निभाया है। ये केवल सहायक नहीं, बल्कि भारतीय सेना के सच्चे साथी और चार पैरों पर चलने वाले वीर योद्धा हैं।
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