बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति इन दिनों गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। बीते 14 दिनों में राज्य में 28 हत्याएं दर्ज की गई हैं, जिससे साफ है कि अपराधियों का मनोबल चरम पर है और प्रशासन इन घटनाओं को रोकने में विफल साबित हो रहा है। राजधानी पटना में कारोबारी गोपाल खेमका की हत्या से शुरू हुआ यह रक्तरंजित सिलसिला अब तक थमा नहीं है। हाल ही में पारस हॉस्पिटल के भीतर एक बंदी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई, जो राज्य में अपराधियों की बेखौफ मौजूदगी को दर्शाता है। इन हत्याओं में जदयू, भाजपा, राजद के नेताओं से लेकर वकील, किसान और व्यापारी तक शामिल हैं।
इसी बीच बिहार के एडीजी कुंदन कृष्णन का एक विवादास्पद बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने अपराध की वजह किसानों के खाली समय को बताया और कहा कि बारिश के बाद किसान अपने काम में लगेंगे तो हत्याएं कम हो जाएंगी। इस बयान की चारों ओर आलोचना हो रही है। डिप्टी सीएम विजय सिन्हा, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर समेत कई नेताओं ने इसे अतार्किक और गैरजिम्मेदाराना करार दिया है। प्रशांत किशोर ने यहां तक कह दिया कि यदि एडीजी को मर्डर करने वाले लोग किसान नजर आ रहे हैं, तो उन्हें अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए।
बीते कुछ दिनों में राज्य में हत्या की कई वीभत्स घटनाएं सामने आई हैं—पूर्णिया में एक ही परिवार के पांच लोगों को जिंदा जलाना, सीवान में ट्रिपल मर्डर, नालंदा में दो बच्चों की गोली मारकर हत्या, और पटना, सीतामढ़ी, बेगूसराय जैसे जिलों में लगातार हो रही वारदातें इस बात की गवाही देती हैं कि बिहार में अपराध बेलगाम हो चुका है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कानून-व्यवस्था एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है और सरकार के सहयोगी दलों से लेकर विपक्षी नेताओं तक सभी इसकी गंभीरता पर सवाल उठा रहे हैं।