अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है। गुजरात से दिल्ली तक फैली यह प्राचीन पर्वतमाला थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने, भूजल स्तर बनाए रखने, जैव विविधता के संरक्षण और दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे क्षेत्र की जलवायु को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है। यही कारण है कि अरावली का संरक्षण लंबे समय से राष्ट्रीय पर्यावरणीय प्राथमिकता रहा है।
केंद्र सरकार का कहना है कि वह अरावली के संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और नवंबर 2025 में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस दिशा में एक मजबूत कदम है। इस फैसले में अरावली की एक यूनिफॉर्म और वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया गया, जिससे वर्षों से चली आ रही कानूनी अस्पष्टता खत्म हुई है। पहले अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएं होने के कारण अवैध खनन और अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता रहा था।
सरकार के अनुसार नई परिभाषा के तहत अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित रहेगा। केवल 0.19 प्रतिशत इलाके में ही सीमित और नियंत्रित खनन की अनुमति होगी, वह भी पहले से मौजूद वैध माइनिंग लीजों के अंतर्गत। नई खनन लीज पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस फैसले को अरावली के लिए “सुरक्षा कवच” बताते हुए कहा कि इससे अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगेगी और सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की मुख्य श्रृंखला का हिस्सा माना गया है। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह वैज्ञानिक मानदंड संरक्षण को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करता है, क्योंकि अब संरक्षित क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि इससे सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ड्रोन सर्विलांस और कानूनी कार्रवाई आसान होगी। साथ ही कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां भी फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और इको-सेंसिटिव जोन जैसे अन्य कानूनों के तहत संरक्षण में बनी रहेंगी।
केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि अस्पष्ट परिभाषा के कारण पहले अवैध खनन फल-फूल रहा था, जबकि अब स्थिति बदल जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अरावली क्षेत्र में रिस्टोरेशन और संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं को तेज करने की योजना है। राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में पहले से चल रही परियोजनाओं को भी इस फैसले से मजबूती मिलेगी।
इसी कड़ी में ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ को सरकार एक अहम पहल के रूप में पेश कर रही है। यह वैश्विक ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ का भारतीय संस्करण है, जिसके तहत अरावली की लगभग 700 किलोमीटर लंबाई के आसपास 5 किलोमीटर चौड़े बफर जोन में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जाएगी। यह परियोजना गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों को कवर करेगी और इसमें बड़े स्तर पर पौधारोपण, जल संरक्षण संरचनाएं और स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने की योजना है।
सरकार का दावा है कि ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट से मरुस्थलीकरण रुकेगा, कार्बन सिंक बढ़ेगा और जैव विविधता को मजबूती मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह परियोजना और प्रभावी होगी, क्योंकि अब संरक्षित क्षेत्र स्पष्ट है और संसाधनों का सही उपयोग संभव होगा। राज्यों और स्थानीय समुदायों को इसमें भागीदार बनाने की भी योजना है।
हालांकि इस फैसले के बाद राजस्थान में ‘सेव अरावली’ आंदोलन तेज हो गया है। जयपुर, अलवर और सीकर जैसे शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं और सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड कर रहा है। आंदोलन से जुड़े कुछ पर्यावरणविदों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि नई परिभाषा से अरावली का संरक्षण कमजोर होगा और खनन व व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी।
केंद्र सरकार इन आशंकाओं को गलतफहमी करार देती है। उसका कहना है कि तथ्य स्पष्ट हैं—90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र सुरक्षित है और खनन सिर्फ 0.19 प्रतिशत तक सीमित है। सरकार का आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल पर्यावरण के नाम पर भ्रम फैला रहे हैं। भाजपा का कहना है कि पिछली सरकारों के दौर में अवैध खनन और लैंड एक्सचेंज जैसे प्रस्ताव सामने आते रहे, जबकि मौजूदा सरकार ने संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
अरावली का मुद्दा केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अरावली कमजोर हुई तो थार मरुस्थल का विस्तार, भूजल संकट और जैव विविधता का नुकसान गंभीर रूप ले सकता है। केंद्र सरकार का दावा है कि नई परिभाषा, सख्त निगरानी और ग्रीन वॉल जैसी परियोजनाओं से अरावली को पहले से ज्यादा मजबूत सुरक्षा मिलेगी।
सरकार ने आंदोलनकारियों से तथ्यों को समझने और संवाद के जरिए चिंताओं को सामने रखने की अपील की है। उसका कहना है कि अरावली का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है और इसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जाएगा। केंद्र का दावा है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली को सुरक्षित रखने की दिशा में एक अहम मील का पत्थर साबित होगा, जहां पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन साधने की कोशिश की गई है।
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