उत्तर प्रदेश के संभल में सामने आए ₹101 करोड़ मूल्य की करीब 38 बीघा सरकारी जमीन के कथित फर्जीवाड़े की जांच अब तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष कौसर अहमद की भूमिका तक पहुंच गई है। पुलिस रिमांड के दौरान संभल नगर पालिका के तत्कालीन अधिशासी अधिकारी और वर्तमान में शाहजहांपुर में सहायक नगर आयुक्त के पद पर तैनात रहे राजकुमार गुप्ता ने कथित तौर पर दावा किया कि वर्ष 2013 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से नगर पालिका की याचिका तत्कालीन चेयरमैन कौसर अहमद के दबाव में वापस ली गई थी। कौसर अहमद को विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान का करीबी बताया गया है। हालांकि इस मामले में जांच अभी जारी है और आरोपों का अंतिम निर्धारण अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई के हवाले से सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, राजकुमार गुप्ता को पुलिस कस्टडी रिमांड पर लेकर मामले से जुड़े कई सवाल पूछे गए। कुछ रिपोर्टों में दावा है कि उनसे 100 से अधिक सवाल किए गए और उन्होंने वर्ष 2013 में हाई कोर्ट की याचिका वापस लेने के फैसले के लिए तत्कालीन चेयरमैन को जिम्मेदार बताया। वहीं एक अन्य स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, राजकुमार गुप्ता 11 घंटे की पुलिस कस्टडी में रहे, जिसमें करीब पांच घंटे विस्तृत पूछताछ हुई।
कौसर अहमद पर क्या आरोप लगाया गया?
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पूर्व ईओ राजकुमार गुप्ता ने पूछताछ में कथित रूप से कहा कि वर्ष 2013 में सरकारी जमीन से जुड़े मुकदमे को इलाहाबाद हाई कोर्ट से वापस लेने का फैसला तत्कालीन पालिकाध्यक्ष कौसर अहमद के दबाव में किया गया था।
पुलिस जांच का एक प्रमुख सवाल यही है कि नगर पालिका ने अपनी ही उस याचिका को वापस क्यों लिया, जो करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को निजी हाथों में जाने से रोकने के लिए दाखिल की गई थी।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, राजकुमार गुप्ता के कथित बयान के बाद तत्कालीन पालिकाध्यक्ष कौसर अहमद की भूमिका पर जांच का दायरा बढ़ा है। हालांकि पुलिस उनसे पहले भी पूछताछ कर चुकी है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उनका नाम पहली बार अब सामने आया है।
11 घंटे की रिमांड, 100 से अधिक सवालों का दावा
रिपोर्टों के मुताबिक, राजकुमार गुप्ता को मुरादाबाद जेल से पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया था। इस दौरान उनसे जमीन के पुराने रिकॉर्ड, हाई कोर्ट में दाखिल याचिका, उसे वापस लेने की प्रक्रिया और अन्य अधिकारियों की संभावित भूमिका को लेकर सवाल किए गए।
भारत समाचार और दैनिक जागरण की रिपोर्टों में दावा किया गया कि राजकुमार गुप्ता से 100 से अधिक सवाल पूछे गए और उन्होंने कथित तौर पर तत्कालीन चेयरमैन के दबाव की बात कही।
हालांकि हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, 11 घंटे की कस्टडी के दौरान करीब पांच घंटे पूछताछ हुई और कौसर अहमद की अनुपस्थिति के कारण दोनों का आमना-सामना नहीं कराया जा सका। पुलिस दोनों के बयानों और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों का मिलान करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
मेडिकल जांच के बाद वापस जेल भेजे गए राजकुमार गुप्ता
पुलिस कस्टडी रिमांड पूरी होने के बाद राजकुमार गुप्ता का मेडिकल परीक्षण कराया गया और उन्हें वापस जेल भेज दिया गया।
पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि हाई कोर्ट से याचिका वापस लेने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया, इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे और सरकारी जमीन के निजी हाथों में जाने से किन लोगों को लाभ हुआ। जांच एजेंसी उपलब्ध दस्तावेजों, तत्कालीन अधिकारियों के बयानों और जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रही है।
क्या है संभल का ₹101 करोड़ जमीन मामला?
पूरा मामला संभल-मुरादाबाद मार्ग पर स्थित तख्तगोसाईं गांव की करीब 38 बीघा ग्राम समाज की जमीन से जुड़ा है।
प्रशासन के मुताबिक, इस जमीन की मौजूदा अनुमानित कीमत ₹101 करोड़ से अधिक है। आरोप है कि कथित फर्जी पट्टे, विवादित नामांतरण आदेश और कानूनी प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं के जरिए इसे निजी हाथों में पहुंचाया गया।
यह मामला कई दशकों पुराना है और इसकी जड़ें वर्ष 1954 तथा 1967 तक जाती हैं।
वर्ष 1954 में नगर पालिका को मिला था जमीन का प्रबंधन
रिपोर्टों के अनुसार, 11 अगस्त 1954 को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक गजट के जरिए तख्तगोसाईं क्षेत्र की करीब 38 बीघा जमीन का प्रबंधन संभल नगर पालिका को सौंपा था।
जांच में आरोप लगाया गया है कि जमीन का स्वामित्व निजी लोगों को देने का अधिकार नहीं होने के बावजूद बाद में इससे जुड़े दस्तावेजों में बदलाव हुआ और निजी दावे खड़े किए गए। प्रशासन का कहना है कि जमीन मूल रूप से सरकारी या ग्राम समाज की थी और नगर पालिका के पास केवल उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी थी।
1967 के कथित फर्जी पट्टे से शुरू हुआ विवाद
पुलिस और प्रशासनिक जांच के मुताबिक, वर्ष 1967 में तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष चिरंजीलाल के कार्यकाल में कथित रूप से सईदुल रहमान के नाम जमीन का पट्टा दिखाया गया।
नगर पालिका का बाद में दावा रहा कि इस कथित पट्टे का उसके आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई वैध आधार मौजूद नहीं था। यही दस्तावेज आगे चलकर निजी स्वामित्व के दावे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बना। प्रशासन ने इसे कथित फर्जी पट्टा बताते हुए पूरे मामले की जांच आगे बढ़ाई।
2008 में नामांतरण आदेश से बदली कहानी
वर्ष 2008 में तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी के आदेश के बाद मामले ने बड़ा मोड़ लिया। रिपोर्टों के मुताबिक, 15 फरवरी 2008 को तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी खेम सिंह खड़क ने कथित 1967 के पट्टे को आधार मानते हुए सईदुल रहमान के पक्ष में आदेश पारित किया।
इस फैसले के बाद जमीन पर निजी स्वामित्व का दावा मजबूत हुआ। नगर पालिका ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया और इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सरकारी जमीन बचाने के लिए हाई कोर्ट गई थी नगर पालिका
तत्कालीन अधिशासी अधिकारी वीके झा ने अप्रैल 2008 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका के जरिए नगर पालिका ने नामांतरण आदेश को चुनौती दी। मामला वर्षों तक हाई कोर्ट में विचाराधीन रहा।
पुलिस जांच में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह बना हुआ है कि सरकारी जमीन के हित में दायर इस याचिका को पांच साल बाद वापस क्यों लिया गया।
वर्ष 2013 में याचिका वापस लेना बना जांच की सबसे बड़ी कड़ी
वर्ष 2011 में राजकुमार गुप्ता संभल नगर पालिका में ईओ के पद पर तैनात हुए थे। वर्ष 2013 में उनके कार्यकाल के दौरान हाई कोर्ट में लंबित याचिका वापस ले ली गई।
आरोप है कि याचिका वापस होने के बाद निजी पक्ष के दावे को चुनौती देने वाली सबसे बड़ी कानूनी बाधा समाप्त हो गई और इसके बाद जमीन की खरीद-बिक्री तथा हिस्सेदारी का रास्ता खुल गया।
अब पुलिस इसी फैसले की परिस्थितियों, तत्कालीन पालिका नेतृत्व की भूमिका और संभावित मिलीभगत की जांच कर रही है।
पूर्व EO का दावा- चेयरमैन के दबाव में लिया फैसला
ताज़ा जांच में राजकुमार गुप्ता के कथित बयान ने मामले को नया मोड़ दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पूछताछ में दावा किया कि हाई कोर्ट से याचिका वापस लेने का कदम तत्कालीन चेयरमैन कौसर अहमद के दबाव में उठाया गया था।
यह राजकुमार गुप्ता का पुलिस के सामने दिया गया कथित बयान है। इसकी पुष्टि जांच में उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों, अन्य आरोपियों के बयानों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होनी बाकी है।
कौसर अहमद से पहले भी हो चुकी है पूछताछ
इस मामले में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कौसर अहमद से पुलिस पहले भी पूछताछ कर चुकी है।
अमर उजाला के अनुसार, जुलाई की शुरुआत में उन्हें संभल कोतवाली बुलाकर करीब ढाई घंटे सवाल किए गए थे। पूछताछ का मुख्य विषय यही था कि हाई कोर्ट में लंबित नगर पालिका की याचिका किस कारण वापस ली गई।
पुलिस ने उनसे पूछा कि नगर पालिका अपनी ही सरकारी जमीन की कानूनी लड़ाई से पीछे क्यों हटी और इस निर्णय में किन लोगों की भूमिका थी।
इसलिए ताज़ा खबर में यह लिखना अधिक सटीक होगा कि राजकुमार गुप्ता के कथित बयान के बाद कौसर अहमद पर लगे आरोपों को नई दिशा मिली है, न कि उनका नाम जांच में पहली बार सामने आया है।
आजम खान का करीबी बताए जाने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा
कौसर अहमद को कई मीडिया रिपोर्टों में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान का करीबी बताया गया है। इस राजनीतिक संबंध के कारण मामला प्रशासनिक और आपराधिक जांच के साथ राजनीतिक चर्चा का विषय भी बन गया है।
हालांकि जमीन मामले में किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी उसके राजनीतिक संबंधों के बजाय जांच, साक्ष्यों और अदालत के निष्कर्षों के आधार पर ही तय होगी।
जमीन पर प्लॉट, कारोबारी प्रतिष्ठान और निर्माण का आरोप
जांच में सामने आया है कि विवादित जमीन के कुछ हिस्सों पर प्लॉटिंग और व्यावसायिक निर्माण किए गए।
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, जमीन पर धर्मकांटा, औद्योगिक इकाई, कार्यालय और अन्य निर्माण भी पाए गए। खाली हिस्सों पर प्रशासन ने ग्राम समाज का बोर्ड लगाकर सरकारी कब्जा स्थापित करने की कार्रवाई की।
प्रशासन इस बात की भी जांच कर रहा है कि सरकारी भूमि पर निर्माण के लिए नक्शे या अन्य मंजूरियां किस आधार पर दी गईं।
प्रशासन ने जमीन को वापस सरकारी खाते में दर्ज कराया
जून 2026 में प्रशासन ने मामले में तेजी से कार्रवाई की। पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद पुराने आदेश को निरस्त किया गया और करीब 38 बीघा जमीन को फिर से ग्राम समाज तथा सरकारी खाते में दर्ज करने की कार्रवाई की गई।
डीएम अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने राजस्व टीम के साथ मौके का निरीक्षण किया और जमीन की पैमाइश कराई। प्रशासन ने खाली जमीन पर ग्राम समाज का बोर्ड भी लगवाया।
31 नामजद समेत अन्य लोग जांच के दायरे में
मामले में लेखपाल की तहरीर पर तत्कालीन अधिकारियों, जमीन से जुड़े निजी पक्षों और खरीदारों समेत 31 नामजद तथा अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की रिपोर्ट है।
आरोपियों में तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता, तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी, नगर पालिका से जुड़े कुछ कर्मचारी और जमीन से जुड़े अन्य पक्ष शामिल बताए गए हैं।
कुछ अन्य रिपोर्टों में कुल आरोपियों की संख्या 32 लिखी गई है। इसलिए प्रकाशन के दौरान एफआईआर की प्रति उपलब्ध न होने की स्थिति में ‘31 नामजद और अन्य अज्ञात’ लिखना अधिक सावधान और विश्वसनीय विकल्प है।
पूर्व EO राजकुमार गुप्ता की गिरफ्तारी
राजकुमार गुप्ता संभल नगर पालिका में तत्कालीन ईओ रह चुके हैं और गिरफ्तारी के समय शाहजहांपुर नगर निगम में सहायक नगर आयुक्त के पद पर तैनात थे।
पुलिस ने उन्हें शाहजहांपुर से हिरासत में लेकर पूछताछ की और बाद में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
पुलिस का कहना है कि जांच में सरकारी जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण में उनकी भूमिका से जुड़े साक्ष्य मिले हैं। इसके बाद उन्हें पुलिस कस्टडी रिमांड पर लेकर आगे की पूछताछ की गई।
पुलिस के सामने अब कई बड़े सवाल
इस पूरे मामले में जांच एजेंसी के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं:
वर्ष 2013 में हाई कोर्ट की याचिका वापस लेने का निर्णय किसने और क्यों लिया?
क्या इस निर्णय के पीछे किसी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव था?
नगर पालिका की सरकारी जमीन निजी लोगों के नाम जाने से किसे आर्थिक लाभ हुआ?
जमीन की खरीद-बिक्री और निर्माण में कौन-कौन लोग शामिल थे?
क्या सरकारी अधिकारियों और निजी भू-माफिया के बीच कोई संगठित मिलीभगत थी?
पुलिस इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड, जमीन की रजिस्ट्री, तत्कालीन अधिकारियों के बयान और अन्य साक्ष्यों के जरिए तलाश रही है।
आरोपों की जांच जारी, अंतिम निष्कर्ष अभी बाकी
₹101 करोड़ के इस जमीन मामले में नए खुलासों के बावजूद जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
पूर्व ईओ राजकुमार गुप्ता द्वारा कौसर अहमद पर दबाव डालने का कथित आरोप पुलिस जांच का हिस्सा है। कौसर अहमद की ओर से विस्तृत पक्ष और जांच एजेंसी का अंतिम निष्कर्ष सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी स्पष्ट हो सकेगी।
ऐसे में इस मामले को प्रकाशित करते समय ‘आरोप’, ‘कथित’, ‘पुलिस के मुताबिक’, ‘मीडिया रिपोर्टों के अनुसार’ और ‘जांच जारी है’ जैसी भाषा का इस्तेमाल जरूरी है।
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