13 जुलाई 1931 की घटना को लेकर एक बार फिर विवाद गहराया है, जब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने श्रीनगर में स्थित ‘नक्शाबाद साहिब’ मजार पर जाकर कथित “13 जुलाई के शहीदों” को श्रद्धांजलि दी। उन्हें प्रशासन ने ऐसा करने से रोका था, लेकिन वह दीवार फांद कर वहाँ पहुँचे और पुलिस से झड़प भी हुई। सोशल मीडिया पर उन्होंने दावा किया कि उन्हें नजरबंद किया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि प्रशासन ने उन्हें दंगाइयों को महिमामंडित करने से रोकने के लिए अनुमति नहीं दी थी।
This is the physical grappling I was subjected to but I am made of sterner stuff & was not to be stopped. I was doing nothing unlawful or illegal. In fact these “protectors of the law” need to explain under what law they were trying to stop us from offering Fatiha pic.twitter.com/8Fj1BKNixQ
— Omar Abdullah (@OmarAbdullah) July 14, 2025
असल में 13 जुलाई, 1931 को क्या हुआ था?
उस दिन श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बाहर महाराजा हरि सिंह की सेना ने 21 मुस्लिम कट्टरपंथियों को गोली मारी थी, जो जेल पर हमला करने और वहाँ बंद राजद्रोही अब्दुल क़दीर को छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे। यह लोग जेल में घुसने, न्यायालय की प्रक्रिया में बाधा डालने, जज के कक्ष में जबरन घुसने और आगजनी-लूटपाट जैसे हिंसक प्रयासों में शामिल थे। इस दौरान पुलिस पर पथराव और हमले भी किए गए। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के आदेश पर गोली चलाई गई, जिसमें 21 उपद्रवी मारे गए।
- इस्लामी तत्वों ने इस घटना को “शहादत” का नाम दे दिया और दंगाइयों को ‘शहीद’ घोषित कर दिया।
- 1948 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद, जब नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार बनी, तो 13 जुलाई को सरकारी तौर पर “शहीद दिवस” घोषित किया गया और इसे लोकतंत्र की लड़ाई बताने की कोशिश की गई।
- उसी समय से ‘शहीदों की मजार’ पर श्रद्धांजलि देना एक राजनीतिक रस्म बन गई, जिसका कट्टरपंथियों ने बार-बार दुरुपयोग किया।
इतिहास का दूसरा पक्ष क्या कहता है?
इतिहासकारों, खासकर कश्मीरी पंडितों और शोधकर्ताओं जैसे सुशील पंडित के अनुसार:
- यह कोई लोकतांत्रिक विद्रोह नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित धार्मिक उन्माद और हिंदू विरोधी हिंसा थी।
- हजारों कश्मीरी हिंदुओं की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार, धर्मांतरण, मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले हुए।
- श्रीनगर के विचारनाग, सफाकदल, भोरी कदल, नवाकदल आदि इलाकों में हिंदुओं की दुकानों और घरों को लूटा और जलाया गया।
- 31 मंदिरों और गुरुद्वारों को नष्ट किया गया, 600 से अधिक हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण हुआ।
अंग्रेजों और साजिश की भूमिका:
- इतिहास बताता है कि ब्रिटिश अधिकारियों ने खुद इस उपद्रव को प्रोत्साहित किया।
- अब्दुल क़दीर जैसे तत्वों को अह्मदिया और ब्रिटिश अफसरों की मदद से भेजा गया ताकि महाराजा हरि सिंह के शासन को अस्थिर किया जा सके।
- श्रीनगर में कुरान की कथित बेअदबी की अफवाह फैलाई गई, जिसका कोई प्रमाण नहीं मिला, लेकिन इसी को आधार बनाकर हिंसा फैलाई गई।
मोदी सरकार की पहल:
- 2020 में पहली बार, केंद्र सरकार ने 13 जुलाई को सरकारी श्रद्धांजलि कार्यक्रम रोक दिया, और इन तथाकथित ‘शहीदों’ के महिमामंडन को बंद किया।
- राज्यपाल शासन के दौरान और अब केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद, जम्मू-कश्मीर में धीरे-धीरे ऐसे प्रतीकों को हटाने का प्रयास हो रहा है जो हिंसा और कट्टरता को वैधता देते हैं।
13 जुलाई, 1931 की घटना को एक ‘शहादत दिवस’ कहना ऐतिहासिक विकृति और सांप्रदायिक राजनीति का परिणाम है। यह दिन कश्मीर के इतिहास में हिंदुओं के पहले संगठित नरसंहार की शुरुआत का प्रतीक है, जिसे कालांतर में राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों ने ‘लोकतांत्रिक आंदोलन’ का मुखौटा पहनाया। इतिहास की सच्चाई को स्वीकार कर, इससे सबक लेना समय की माँग है, ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों को दोहराया न जाए।