लिपुलेख दर्रा से कैलाश मानसरोवर यात्रा 6 साल बाद फिर से शुरू होने जा रही है, लेकिन इस बीच भारत-नेपाल के बीच नया कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। नेपाल ने इस मार्ग पर आपत्ति जताते हुए लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र पर अपना दावा दोहराया है।
नेपाल की बालेन शाह सरकार का कहना है कि ये क्षेत्र उसके अभिन्न हिस्से हैं और यहां से किसी भी यात्रा या गतिविधि को नेपाल के कानून के खिलाफ माना जाएगा। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन को औपचारिक रूप से इस स्थिति से अवगत कराया है।
नेपाली भूमि लिपुलेक हुँदै कैलाश मानसरोवर यात्राका विषयमा मिडियाबाट सोधिएका प्रश्नका सम्बन्धमा परराष्ट्र प्रवक्ताको जवाफ
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— MOFA of Nepal 🇳🇵 (@MofaNepal) May 3, 2026
मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र सुगौली संधि के अनुसार नेपाल का हिस्सा हैं। साथ ही नेपाल ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ऐतिहासिक दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर इस मुद्दे को बातचीत के जरिए हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत का रुख
भारत ने नेपाल के दावे को सख्ती से खारिज कर दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और यह दशकों से उपयोग में है।
Our response to media queries regarding comments made by Foreign Ministry of Nepal on border issue in the context of the Kailash Mansarovar Yatra ⬇️
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— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) May 3, 2026
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत का रुख इस मुद्दे पर हमेशा एक जैसा रहा है और नेपाल के एकतरफा दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। भारत ने यह भी कहा कि वह नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है।
पुराना विवाद
लिपुलेख और कालापानी को लेकर भारत-नेपाल विवाद साल 2020 में तब तेज हुआ था जब नेपाल ने इन क्षेत्रों को अपने नए आधिकारिक नक्शे में शामिल किया था। यह कदम भारत द्वारा धारचूला-लिपुलेख सड़क के उद्घाटन के बाद आया था, जो कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
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