बिहार में कायस्थ जाति की आबादी महज 0.6 प्रतिशत है, इसके बावजूद एक कायस्थ युवा नेता को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी देना मजबूत राजनीतिक संदेश देता है।
प्रधानमंत्री मोदी का नजरिया शुरू से यही रहा है कि जाति की दीवारों को तोड़कर योग्यता, समर्पण और क्षमता को प्राथमिकता दी जाए। जानकारों के मुताबिक, नितिन नबीन का उदय इसी सोच का प्रतीक है, जो कास्ट पॉलिटिक्स के चक्रव्यूह में फंसी विपक्षी राजनीति को सीधी चुनौती देता है। यह नियुक्ति केवल प्रमोशन नहीं, बल्कि उस नैरेटिव की शुरुआत है, जहां वोट बैंक से ज्यादा बड़े विजन और नेतृत्व क्षमता को महत्व दिया जाता है।
बिहार सरकार की हालिया जातिगत जनगणना के अनुसार, राज्य की कुल 13 करोड़ आबादी में कायस्थ समुदाय की हिस्सेदारी महज 0.6 प्रतिशत, यानी लगभग 7.8 लाख बताई गई है। हालांकि कई कायस्थ संगठन इन आंकड़ों को भ्रामक मानते हैं। इसके बावजूद यह सच है कि ऐतिहासिक रूप से कायस्थों का प्रभाव आबादी से कहीं अधिक रहा है। प्रशासनिक, शैक्षणिक और बौद्धिक क्षेत्रों में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें वोट बैंक से ज्यादा एक प्रभावशाली ‘इन्फ्लुएंस बैंक’ बनाती है।
पीएम मोदी का राजनीतिक विजन राष्ट्रीय एकता पर आधारित रहा है, जहां जाति को ‘वोट डिवाइडर’ नहीं बल्कि ‘ब्रिज बिल्डर’ बनाया जाए। बिहार की राजनीति में यादव (14.26%), कुशवाहा (4.21%) और भूमिहार (2.87%) जैसी जातियों की संख्या देखकर रणनीति बनाने की परंपरा रही है, लेकिन नितिन नबीन की नियुक्ति इस सोच को चुनौती देती है। यह बताता है कि बीजेपी के लिए सामाजिक न्याय का मतलब केवल संख्या नहीं, बल्कि अंत्योदय के साथ योग्यता को सम्मान देना भी है।

देश के अन्य राज्यों में भी कायस्थों की आबादी सीमित है, लेकिन प्रभाव रणनीतिक है। उत्तर प्रदेश में करीब 0.8 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में लगभग 2.7 प्रतिशत, दिल्ली में 2–3 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में करीब 0.7 प्रतिशत कायस्थ आबादी मानी जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल आबादी करीब 2 प्रतिशत के आसपास आंकी जाती है। साफ है कि यह कोई बड़ा वोट बैंक नहीं, लेकिन शहरी, शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग में इसकी गहरी पैठ है।
कहा जाता है कि अगर किसी समुदाय ने बुद्धिजीवी परंपरा को संभालकर रखा है तो वह कायस्थ समुदाय है। ऐसे समय में जब जातिगत जनगणना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे हैं, बीजेपी जाति को ‘डिवाइडर’ की बजाय ‘यूनिफायर’ के रूप में पेश करना चाहती है। नितिन नबीन का चयन यूपी–बिहार गठजोड़ को भी मजबूती देता है, जहां कायस्थ वोटर अन्य वर्गों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 0.6 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद कायस्थों का सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व करीब 6.68 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में भी IAS–IPS जैसी सेवाओं में उनकी मजबूत उपस्थिति मानी जाती है। पश्चिम बंगाल में वे TMC और BJP दोनों के लिए अहम हैं, जबकि दिल्ली में शहरी मध्यम वर्ग का कायस्थ समाज मोदी की ‘एस्पिरेशनल पॉलिटिक्स’ से सीधे जुड़ता है। कम संख्या के बावजूद कई राज्यों में वे ‘स्विंग वोटर’ की भूमिका निभाते हैं।
भारतीय राजनीति लंबे समय से जातिगत समीकरणों में उलझी रही है—बिहार में RJD, यूपी में समाजवादी पार्टी और बंगाल में TMC अपनी-अपनी पहचान आधारित राजनीति करती रही हैं। ऐसे में नितिन नबीन का चयन एक साथ कई संदेश देता है। पीएम मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नजरिया यहां ‘जाति-मुक्त राजनीति’ के रूप में सामने आता है, जहां संख्या नहीं, क्षमता को मापदंड बनाया जाता है।
नितिन नबीन का राजनीतिक सफर भी इसी सोच को मजबूत करता है। भाजपा युवा मोर्चा से लेकर पांच बार विधायक, बिहार सरकार में मंत्री और अब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तक का सफर पीएम मोदी की ‘युवा ऊर्जा’ वाली राजनीति को दर्शाता है। 45 वर्ष की उम्र में उनका यह उदय बताता है कि मेहनत और नेतृत्व जाति से ऊपर है।
दरअसल, नितिन नबीन सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘कास्ट से कास्टलेस पॉलिटिक्स’ की ओर बढ़ती मोदी की रणनीतिक सोच का प्रतीक हैं। यह नियुक्ति कास्ट पॉलिटिक्स को आईना दिखाती है और साफ संदेश देती है कि भारत की विविधता को जोड़ना है, बांटना नहीं। जानकारों का मानना है कि अगर विपक्ष इस संकेत को समझे, तो उसे अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि पीएम मोदी की खींची यह बड़ी लकीर आने वाले समय में राजनीतिक नैरेटिव को बदलने की ताकत रखती है।
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