बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ रहा था, बल्कि उसके भीतर एक गहरी वैचारिक मंथन प्रक्रिया भी चल रही थी। यह संघर्ष इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूम रहा था कि स्वतंत्रता के बाद भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा—क्या वह अपनी सभ्यतागत जड़ों, सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक ताने-बाने को केंद्र में रखेगा या फिर पश्चिमी देशों से आयातित वैचारिक ढाँचों के आधार पर स्वयं को नए रूप में गढ़ेगा। इसी वैचारिक संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुव उभरे—वामपंथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)।
विचारधाराओं की लड़ाई कभी अल्पकालिक नहीं होती। यह वर्षों नहीं बल्कि दशकों और कभी-कभी सदियों तक चलती है। आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में हैं, तब RSS और CPI दोनों की स्थापना को सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस सौ वर्षों के वैचारिक संघर्ष के बाद स्थिति यह दिखाई देती है कि भारत में वामपंथ राजनीतिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर सिमटता जा रहा है, जबकि RSS समाज के लगभग हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर गाँव-शहर में अपनी जड़ें जमा चुका है। यह अंतर संयोग नहीं, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोणों और कार्यशैलियों का परिणाम है।
वामपंथी विचारधारा की जड़ें मार्क्सवाद और लेनिनवाद जैसी उन धाराओं में हैं, जो यूरोप और रूस की औद्योगिक परिस्थितियों से निकली थीं। भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की शुरुआत 1920 में ताशकंद में हुई, जहाँ एम.एन. रॉय जैसे नेताओं ने CPI की नींव रखी। 1925 में कानपुर सम्मेलन के बाद इसे औपचारिक रूप मिला। शोषण और असमानता के खिलाफ़ तीखी आवाज़ के कारण वामपंथ शुरुआती दौर में आकर्षक लगा, लेकिन इसकी सीमा यह रही कि उसने भारतीय समाज को केवल वर्ग संघर्ष के चश्मे से देखने की कोशिश की, जबकि भारत एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना वाला देश है।
इसी दौर में 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। RSS का उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि समाज को संगठित और सशक्त बनाना था। उसने राष्ट्र को केवल भूगोल नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई माना। संघ ने ऊपर से विचार थोपने के बजाय समाज के बीच जाकर काम करने की रणनीति अपनाई। शाखा, प्रचारक और गुरु दक्षिणा—इन तीन आधारों ने RSS को एक संगठन के बजाय जन-आंदोलन का स्वरूप दिया।
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में वामपंथ को राजनीतिक मजबूती मिली। 1951-52 के चुनाव में CPI कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि RSS को महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद संघ ने सामाजिक कार्यों के माध्यम से अपनी यात्रा जारी रखी। दूसरी ओर, वामपंथ भीतर से टूटने लगा। सोवियत संघ और चीन के मतभेद, 1964 में CPI(M) का गठन, नक्सलबाड़ी आंदोलन और बाद के वर्षों में माओवादी धड़े—इन सबने वामपंथ को लगातार विभाजित किया।
संस्कृति के प्रश्न पर दोनों ध्रुवों का दृष्टिकोण बिल्कुल भिन्न रहा। वामपंथ ने धर्म को ‘अफीम’ मानते हुए भारतीय परंपराओं, त्योहारों और धार्मिक प्रतीकों को संदेह की दृष्टि से देखा। इसके कारण वह आम समाज से कटता चला गया। इसके विपरीत, RSS ने भारतीय संस्कृति को एक शक्ति के रूप में स्वीकार किया और परंपराओं के साथ चलते हुए समाज को संगठित करने का प्रयास किया। जहाँ वामपंथ को भारत की पहचान से समस्या थी, वहीं RSS ने उसी पहचान को समाधान का आधार बनाया।
हिंसा के प्रश्न पर भी यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। वामपंथी आंदोलनों का एक हिस्सा सशस्त्र संघर्ष और हिंसा से जुड़ा रहा, जिसका चरम रूप नक्सलवाद में दिखा। इससे जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास बाधित हुआ। इसके विपरीत, RSS ने संगठनात्मक स्तर पर हिंसा को कभी साधन नहीं माना और सेवा, शिक्षा, आपदा राहत और सामाजिक कार्यों के जरिए अपनी पहचान बनाई। सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम और हजारों अन्य सेवा प्रकल्पों के माध्यम से संघ ने जमीनी स्तर पर भरोसा अर्जित किया।
राजनीतिक स्तर पर वामपंथ का पतन धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ। 2004 में जहाँ लेफ्ट पार्टियों के पास 59 लोकसभा सीटें थीं, वहीं 2019 तक यह संख्या घटकर 5 रह गई। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में दशकों तक शासन करने के बावजूद वामपंथ कोई ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत नहीं कर पाया जिसे उसकी वैचारिक उपलब्धि कहा जा सके। केरल, जो उसका अंतिम गढ़ माना जाता था, वहाँ भी अब उसके प्रभाव में गिरावट के संकेत दिखने लगे हैं।
बौद्धिक मोर्चे पर भी वामपंथ की स्थिति कमजोर हुई है। कभी विश्वविद्यालयों और मीडिया पर उसका प्रभुत्व था, लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद उसका वैचारिक आधार हिल गया। उसने आत्ममंथन की बजाय पुरानी शब्दावली और ढर्रे में काम जारी रखा। इसके विपरीत, RSS से जुड़े विचारकों और संस्थानों ने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर वैकल्पिक विमर्श खड़ा किया और डिजिटल युग के माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया।
अंततः, भारत में वामपंथ के हाशिये पर जाने का सबसे बड़ा कारण उसका दृष्टिकोण रहा। वह सत्ता और संस्थानों के माध्यम से समाज बदलना चाहता था, जबकि RSS ने समाज के भीतर से परिवर्तन का मार्ग चुना। सत्ता RSS के लिए साधन रही, लक्ष्य नहीं। यही कारण है कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद RSS की सामाजिक पकड़ मजबूत होती गई, जबकि वामपंथ सत्ता से बाहर होते ही जमीनी स्तर पर बिखरता चला गया। यही अंतर आज के भारत में इस वैचारिक संघर्ष की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
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