अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। नई योजना के अनुसार, 1 अगस्त 2026 से अगले दो वर्षों तक आयातित जेनेरिक दवाओं पर कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद अगस्त 2028 से टैरिफ बढ़ाकर 100 प्रतिशत और अगले चरण में 200 प्रतिशत तक करने की योजना है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य दवाओं के उत्पादन को वापस अमेरिका लाना, विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम करना और घरेलू फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। हालांकि, इस कदम का सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अमेरिका को कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका में करीब 90 प्रतिशत प्रिस्क्रिप्शन जेनेरिक दवाओं के होते हैं। भारत में बनी दवाएँ अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और भारतीय फार्मा कंपनियाँ अमेरिका में भरे जाने वाले लगभग 47 प्रतिशत जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन की आपूर्ति करती हैं।
ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के टैरिफ पर क्या कहा?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर नई टैरिफ नीति की जानकारी देते हुए कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली जेनेरिक दवाओं को दो वर्षों तक शून्य प्रतिशत टैरिफ की सुविधा मिलेगी।
इस दो वर्षीय अवधि को विदेशी फार्मा कंपनियों के लिए अमेरिका में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद आयातित जेनेरिक दवाओं पर पहले 100 प्रतिशत और बाद में 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की योजना है।
ट्रंप के अनुसार, जो फार्मास्युटिकल कंपनियाँ अमेरिका में प्लांट, मशीनरी और उत्पादन सुविधाएँ स्थापित करने की दिशा में कदम नहीं उठाएँगी, उन्हें अधिक टैरिफ और आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि इस नीति का उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा करना, आवश्यक दवाओं की सप्लाई सुनिश्चित करना और अमेरिका को विदेशी दवा निर्माताओं पर कम निर्भर बनाना है।
पेटेंटेड और ब्रांडेड दवाओं की नीति में बदलाव नहीं
ट्रंप ने स्पष्ट किया कि पेटेंटेड, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं पर पहले से लागू अमेरिकी नीति जारी रहेगी। नई घोषणा मुख्य रूप से कम कीमत वाली आयातित जेनेरिक दवाओं से संबंधित है।
अमेरिका पहले ही ब्रांडेड और पेटेंट वाली कुछ दवाओं पर अलग टैरिफ नीति लागू कर चुका है। जेनेरिक दवाओं को उस समय व्यापक राहत दी गई थी, लेकिन अब इन्हें भी चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था के दायरे में लाया जा रहा है।
भारत पर क्यों पड़ सकता है बड़ा असर?
भारत को कम कीमत और बड़े पैमाने पर जेनेरिक दवाएँ बनाने की क्षमता के कारण अक्सर ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है। भारतीय कंपनियाँ अमेरिका को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर, डिप्रेशन, संक्रमण, गर्भनिरोध और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई आवश्यक दवाएँ सप्लाई करती हैं।
भारत की प्रमुख फार्मा कंपनियों में सन फार्मा, सिप्ला, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, ग्लेनमार्क, ऑरोबिंदो फार्मा, बायोकॉन और जायडस लाइफसाइंसेज शामिल हैं। इनमें से कई कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल फार्मास्युटिकल निर्यात करीब 30.47 अरब डॉलर रहा। अमेरिका भारतीय फार्मा कंपनियों के सबसे बड़े बाजारों में से एक है। इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का अमेरिका को दवा निर्यात लगभग 8.7 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।
भारतीय फार्मा कंपनियों के सामने क्या चुनौतियाँ होंगी?
अमेरिका द्वारा 100 से 200 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने की स्थिति में भारतीय जेनेरिक दवाओं की कीमतें अमेरिकी बाजार में काफी बढ़ सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा क्षमता कमजोर होने की आशंका है।
भारतीय कंपनियों के सामने प्रमुख रूप से ये चुनौतियाँ आ सकती हैं:
1. अमेरिका में दवाओं की कीमत बढ़ने का खतरा
यदि कंपनियाँ टैरिफ का खर्च खुद वहन नहीं करतीं, तो अतिरिक्त लागत अमेरिकी वितरकों, अस्पतालों, बीमा कंपनियों और मरीजों पर डाली जा सकती है। इससे अमेरिका में कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएँ महँगी हो सकती हैं।
2. भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर दबाव
जेनेरिक दवाओं का कारोबार पहले से ही कम लाभ मार्जिन पर चलता है। भारी टैरिफ के बाद कंपनियों के पास कीमत बढ़ाने या अपना मुनाफा घटाने के सीमित विकल्प होंगे।
3. अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का दबाव
टैरिफ से बचने के लिए भारतीय कंपनियाँ अमेरिका में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर सकती हैं। हालांकि अमेरिका में श्रम, जमीन, बिजली, पर्यावरणीय मंजूरी और उत्पादन की लागत भारत की तुलना में अधिक हो सकती है।
4. सप्लाई चेन में बदलाव
भारतीय कंपनियों को अमेरिका में स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी, कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग या नई उत्पादन इकाइयाँ शुरू करनी पड़ सकती हैं। इससे पूरी फार्मा सप्लाई चेन में बड़े बदलाव आने की संभावना है।
5. अमेरिकी मरीजों पर भी असर
भारतीय जेनेरिक दवाएँ अमेरिका में इलाज की लागत कम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारतीय दवाओं की सप्लाई कम होने या कीमत बढ़ने से अमेरिकी मरीजों, अस्पतालों और बीमा कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है।
भारतीय दवाओं पर अमेरिका कितना निर्भर है?
अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं में भारतीय कंपनियों की भागीदारी बेहद बड़ी है। IQVIA की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय फार्मा कंपनियों ने वर्ष 2022 में अमेरिका में भरे गए कुल जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन में लगभग 47 प्रतिशत की आपूर्ति की थी।
भारतीय कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में बायोसिमिलर दवाओं की मात्रा का भी करीब 15 प्रतिशत उपलब्ध कराती हैं। इसका अर्थ है कि भारतीय फार्मा उद्योग केवल भारत के निर्यात के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।
क्या तुरंत लागू होगा 200 प्रतिशत टैरिफ?
नहीं। प्रस्तावित व्यवस्था में भारतीय और अन्य विदेशी कंपनियों को दो वर्षों की राहत अवधि दी गई है। 1 अगस्त 2026 से अगस्त 2028 तक जेनेरिक दवाओं पर शून्य प्रतिशत टैरिफ रहेगा।
अगस्त 2028 से 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने और उसके बाद इसे 200 प्रतिशत तक बढ़ाने की योजना है। इसलिए भारतीय कंपनियों के पास अपनी रणनीति बदलने, अमेरिकी सरकार से बातचीत करने और अमेरिका में उत्पादन क्षमता विकसित करने के लिए सीमित समय होगा।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से मिल सकती है राहत?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते तथा फार्मास्युटिकल उत्पादों को लेकर बातचीत जारी रहने की स्थिति में भारतीय दवा कंपनियों को कुछ छूट या अलग व्यवस्था मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अमेरिका ने इससे पहले जापान, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, स्विट्जरलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे कुछ व्यापारिक साझेदारों को फार्मा टैरिफ के मामले में विशेष व्यवस्था या सीमित राहत दी है। इसलिए भारत सरकार आने वाले समय में जेनेरिक दवाओं और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स को लेकर विशेष छूट की माँग कर सकती है।
हालांकि, जब तक अमेरिका की ओर से विस्तृत अधिसूचना, उत्पादवार टैरिफ सूची और भारत से होने वाले आयात से जुड़ी शर्तें जारी नहीं होतीं, तब तक भारतीय कंपनियों पर वास्तविक आर्थिक प्रभाव का सही आकलन करना मुश्किल होगा।
भारतीय फार्मा शेयरों पर भी रहेगी नजर
ट्रंप की घोषणा के बाद सन फार्मा, सिप्ला, डॉ. रेड्डीज, ल्यूपिन, ऑरोबिंदो फार्मा और अन्य निर्यात आधारित फार्मा कंपनियाँ निवेशकों के रडार पर आ गई हैं।
बाजार विशेषज्ञ अब यह आकलन करेंगे कि इन कंपनियों की अमेरिकी बिक्री कितनी है, उनके कितने प्लांट अमेरिका में मौजूद हैं और वे टैरिफ का कितना खर्च ग्राहकों तक पहुँचा सकती हैं।
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