पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार संगठित अपराध, रंगदारी, हिंसक उपद्रव, सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों पर हमलों से निपटने के लिए दो सख्त विधेयक लाने की तैयारी कर रही है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित कानूनों में हिंसा के दौरान सार्वजनिक या निजी संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई जिम्मेदार लोगों से कराने, चिह्नित असामाजिक तत्वों को निर्धारित क्षेत्रों से बाहर करने और गंभीर मामलों में निवारक हिरासत जैसे प्रावधान शामिल हैं।
इन विधेयकों को सोमवार, 29 जून 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा में पेश किए जाने की संभावना है। इससे पहले 22 जून को इन्हें राज्य मंत्रिमंडल के सामने विचार के लिए रखे जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
विधानसभा में पेश होंगे दो अलग-अलग विधेयक
राज्य सरकार सार्वजनिक व्यवस्था और संगठित असामाजिक गतिविधियों से निपटने के लिए दो अलग कानूनी प्रस्ताव ला रही है।
पहला नया विधेयक—
द वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026
दूसरा—
द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर अमेंडमेंट बिल, 2026
दूसरे विधेयक के माध्यम से वर्ष 1972 के पश्चिम बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट में संशोधन किया जाएगा। पुराना कानून पूरी तरह समाप्त या प्रतिस्थापित नहीं किया जा रहा, बल्कि उसके दायरे और नुकसान की वसूली संबंधी व्यवस्था को मजबूत करने का प्रस्ताव है।
क्या मानी जाएगी असामाजिक गतिविधि?
प्रस्तावित सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक में ऐसी गतिविधियों को असामाजिक गतिविधि के दायरे में रखने की बात कही गई है, जिनसे—
- आम जनता में भय, असुरक्षा या आतंक उत्पन्न हो
- जीवन और संपत्ति को गंभीर खतरा पैदा हो
- सार्वजनिक व्यवस्था या शांति भंग हो
- वैध व्यवसाय, व्यापार या रोजगार में बाधा आए
- किसी व्यक्ति को उसकी चल या अचल संपत्ति से अवैध रूप से बेदखल किया जाए
- सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचे
- अवैध खनन, पत्थर खनन, बालू उत्खनन या वन एवं वन्यजीव संसाधनों की तस्करी से सरकारी राजस्व को नुकसान हो
सरकार का कहना है कि यह परिभाषा संगठित गिरोहों, रंगदारी नेटवर्क, जमीन कब्जाने वाले समूहों और अवैध खनन सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई में सहायता करेगी।
‘गुंडा’ की भी तय होगी कानूनी परिभाषा
विधेयक में ऐसे व्यक्ति को ‘गुंडा’ या संगठित असामाजिक तत्व के रूप में चिह्नित करने का प्रस्ताव है, जो स्वयं या किसी गिरोह, समूह अथवा सिंडिकेट के सदस्य के रूप में बार-बार गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो।
इसके दायरे में अपराध की योजना बनाने, उसे आर्थिक सहायता देने, अपराधियों को संगठित करने या उन्हें अन्य प्रकार की मदद उपलब्ध कराने वाले लोग भी आ सकते हैं।
हथियार, मादक पदार्थ, विस्फोटक, संगठित अपराध और मानव तस्करी जैसे गंभीर मामलों में शामिल लोगों के विरुद्ध भी प्रस्तावित कानून के तहत कार्रवाई हो सकेगी।
अधिकतम 12 महीने की निवारक हिरासत
नए विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान निवारक हिरासत से संबंधित है।
राज्य सरकार या अधिकृत अधिकारी को यह अधिकार देने का प्रस्ताव है कि यदि किसी व्यक्ति के भविष्य में सार्वजनिक सुरक्षा अथवा कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनने की ठोस आशंका हो, तो उसे निवारक रूप से हिरासत में लिया जा सके।
प्रस्ताव के अनुसार पुष्टि के बाद ऐसी हिरासत अधिकतम 12 महीने तक जारी रह सकती है। हालांकि यह अवधि स्वतः लागू नहीं होगी और हिरासत आदेश की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत समीक्षा की जाएगी।
निवारक हिरासत किसी पुराने अपराध की सजा नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित गंभीर गतिविधि को रोकने के लिए उठाया गया कदम माना जाता है।
हिरासत में लिए गए व्यक्ति को बताए जाएंगे कारण
प्रस्तावित कानून में हिरासत के आदेश की जानकारी संबंधित व्यक्ति को देने का प्रावधान है।
सामान्य स्थिति में हिरासत के कारण और संबंधित दस्तावेज पांच दिनों के भीतर उपलब्ध कराए जाने होंगे। हिरासत में लिया गया व्यक्ति राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड के सामने अपना पक्ष तथा आपत्ति प्रस्तुत कर सकेगा।
हालांकि ऐसी संवेदनशील जानकारी को रोका जा सकता है, जिसके सार्वजनिक होने से गोपनीय स्रोत, राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा या कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो।
हाईकोर्ट के वर्तमान या पूर्व जज की अध्यक्षता में बोर्ड
निवारक हिरासत के मामलों की समीक्षा के लिए एक सलाहकार बोर्ड गठित करने का प्रस्ताव है।
बोर्ड का अध्यक्ष कलकत्ता हाईकोर्ट का वर्तमान अथवा पूर्व न्यायाधीश हो सकता है। इसके दो अन्य सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे, जो हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता रखते हों।
बोर्ड यह जांच करेगा कि हिरासत के लिए पर्याप्त आधार और उचित कारण मौजूद हैं या नहीं। पर्याप्त कारण नहीं मिलने पर संबंधित व्यक्ति को रिहा करना होगा।
इस प्रक्रिया को प्रस्तावित कानून में प्रशासनिक शक्तियों पर न्यायिक निगरानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
जिले से बाहर किए जा सकेंगे चिह्नित असामाजिक तत्व
विधेयक में जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त या राज्य सरकार से अधिकृत डीआईजी स्तर के अधिकारी को किसी चिह्नित असामाजिक तत्व के खिलाफ क्षेत्र-निष्कासन का आदेश जारी करने की शक्ति देने का प्रस्ताव है।
यदि अधिकारी को उचित आधार पर यह आशंका हो कि संबंधित व्यक्ति किसी जिले या क्षेत्र में अपराध अथवा हिंसा कर सकता है, तो उसे उस क्षेत्र से बाहर जाने का निर्देश दिया जा सकेगा।
ऐसा व्यक्ति अधिकतम एक वर्ष तक संबंधित क्षेत्र या जिले में लौटने से प्रतिबंधित किया जा सकता है। अधिकारी उसे अपनी गतिविधियों की नियमित जानकारी देने या निर्धारित प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित होने का आदेश भी दे सकते हैं।
आदेश जारी करने से पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना प्रस्तावित है। वह आदेश के खिलाफ निर्धारित अवधि में राज्य सरकार के सामने अपील भी कर सकेगा।
दंगे में संपत्ति के नुकसान की होगी वसूली
1972 के पश्चिम बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का प्रमुख उद्देश्य हिंसा और तोड़फोड़ में हुए नुकसान की वसूली के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।
यदि किसी गैरकानूनी सभा, दंगे, हिंसक प्रदर्शन, सार्वजनिक उपद्रव या अन्य कानून-व्यवस्था संबंधी घटना में सरकारी अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचता है, तो जिम्मेदार पाए गए लोगों से मुआवजा वसूला जा सकेगा।
नुकसान में केवल क्षतिग्रस्त संपत्ति का मूल्य ही नहीं, बल्कि प्रशासन द्वारा स्थिति नियंत्रित करने, सुरक्षा उपलब्ध कराने और सुधारात्मक उपाय करने में खर्च की गई राशि भी शामिल की जा सकती है।
बनेगा विशेष दावा आयोग
नुकसान की राशि तय करने के लिए विशेष दावा आयोग गठित करने का प्रस्ताव है।
सरकारी संपत्ति को नुकसान होने पर संबंधित विभाग या अधिकारी जिला मजिस्ट्रेट अथवा पुलिस आयुक्त को नुकसान और अनुमानित राशि की रिपोर्ट देगा।
यदि उसी घटना में निजी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा है, तो संपत्ति का मालिक दावा आयोग के सामने मुआवजे के लिए आवेदन कर सकेगा।
आयोग उपलब्ध दस्तावेजों, पुलिस रिकॉर्ड, तस्वीरों, वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर नुकसान और जिम्मेदारी का निर्धारण कर सकेगा।
भड़काने और संगठित करने वालों पर भी जिम्मेदारी
प्रस्तावित संशोधन में केवल मौके पर तोड़फोड़ करने वाले व्यक्ति को ही जिम्मेदार ठहराने की बात नहीं है।
हिंसा को भड़काने, उकसाने, संगठित करने, आर्थिक सहायता देने या आरोपित हमलावरों को जानबूझकर संरक्षण देने वालों पर भी जवाबदेही तय हो सकती है।
इसके लिए घटना और संपत्ति के नुकसान के बीच संबंध स्थापित करना आवश्यक होगा। जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण निर्धारित कानूनी और दावा प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।
यूपी के नुकसान वसूली कानून से तुलना
प्रस्तावित मुआवजा व्यवस्था की तुलना उत्तर प्रदेश के ‘रिकवरी ऑफ डैमेजेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी एक्ट, 2020’ से की जा रही है।
उत्तर प्रदेश के कानून में हिंसा और सार्वजनिक उपद्रव के दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों से क्षतिपूर्ति वसूलने की व्यवस्था है।
पश्चिम बंगाल सरकार भी दावा आयोग और नुकसान की वसूली का तंत्र बनाना चाहती है। हालांकि पश्चिम बंगाल का अंतिम कानून विधानसभा में चर्चा, संशोधन और पारित होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
पुराने कानून में क्यों किया जा रहा बदलाव?
पश्चिम बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट वर्ष 1972 में बनाया गया था। यह दंगे, आगजनी, लूटपाट, विस्फोटकों के प्रयोग और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से संबंधित है।
राज्य सरकार का मानना है कि पांच दशक से अधिक पुराने कानून में वर्तमान समय के संगठित अपराध, सिंडिकेट, अवैध वसूली, हिंसक भीड़ और संपत्ति नुकसान से निपटने के लिए अधिक स्पष्ट एवं मजबूत प्रावधान आवश्यक हैं।
नई व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि संभावित हिंसा को रोकने और पीड़ित संपत्ति मालिकों को मुआवजा दिलाने का कानूनी तंत्र तैयार करना भी बताया जा रहा है।
कानून के दुरुपयोग को लेकर उठ सकते हैं सवाल
निवारक हिरासत और क्षेत्र-निष्कासन जैसे प्रावधानों के कारण विधेयक पर राजनीतिक एवं कानूनी बहस होने की संभावना है।
विरोध करने वाले पक्ष यह सवाल उठा सकते हैं कि किसी व्यक्ति को भविष्य की आशंका के आधार पर हिरासत में लेने या जिले से बाहर करने की शक्ति का राजनीतिक विरोधियों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दुरुपयोग तो नहीं होगा।
सरकार का तर्क है कि सलाहकार बोर्ड, अपील का अधिकार, आदेश के कारण बताने की बाध्यता और समय-सीमा जैसे प्रावधान नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए रखे गए हैं।
विधानसभा में विधेयक पेश होने के बाद इसके प्रत्येक प्रावधान पर चर्चा होगी। कानून बनने के लिए दोनों विधेयकों को विधानसभा की मंजूरी और आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
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