प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 129वें एपिसोड के माध्यम से देश को संबोधित किया। यह वर्ष 2025 का अंतिम एपिसोड था, जिसमें उन्होंने बीते साल की उपलब्धियों के साथ-साथ वर्ष 2026 की चुनौतियों, संभावनाओं और विकास के विजन पर भी अपने विचार रखे। इस दौरान प्रधानमंत्री ने देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रेरणादायक प्रयासों का उल्लेख करते हुए लोगों की सराहना की।
मन की बात में पीएम मोदी ने मणिपुर के चुराचांदपुर की मार्गरेट रामथार्सिएम का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम उन लोगों को सामने लाने का मंच है, जो अपने परिश्रम से पारंपरिक कलाओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को भी सशक्त बना रहे हैं। पीएम मोदी ने बताया कि मार्गरेट रामथार्सिएम ने मणिपुर के पारंपरिक उत्पादों, हैंडीक्राफ्ट, बांस और लकड़ी से बनी वस्तुओं को एक बड़े विजन के साथ आगे बढ़ाया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इसी विजन के कारण मार्गरेट एक हैंडीक्राफ्ट आर्टिस्ट से आगे बढ़कर लोगों के जीवन में बदलाव लाने का माध्यम बनीं। उन्होंने पारंपरिक उत्पादों और हस्तशिल्प को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ कई स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए मार्गरेट के प्रयासों की जमकर तारीफ की।
Proud of Margaret Ramtharsiem from Manipur’s Churachandpur for her work towards popularising Manipur’s traditional handicrafts and also empowering the lives of others.#MannKiBaat pic.twitter.com/xo1OQqM1pP
— Narendra Modi (@narendramodi) December 29, 2025
पीएम मोदी ने यह भी बताया कि आज मार्गरेट जी की यूनिट में 50 से अधिक कलाकार काम कर रहे हैं। अपनी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने दिल्ली सहित देश के कई राज्यों में अपने उत्पादों का बाजार विकसित किया है, जिससे स्थानीय कारीगरों को स्थायी आजीविका मिल रही है।
मन की बात में अपना नाम लिए जाने पर मार्गरेट रामथार्सिएम ने खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की पहल ने आदिवासी पारंपरिक पहनावे और हैंडीक्राफ्ट को बढ़ावा देने के उनके जुनून को और मजबूत किया है। उन्होंने बताया कि सिर्फ वे ही नहीं, बल्कि कई स्थानीय कारीगर भी अपने आदिवासी शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित और प्रेरित हुए हैं।
मार्गरेट ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री की पहल से उनका आत्मविश्वास और ऊर्जा बढ़ी है, जिससे वे अपने काम को बड़े पैमाने पर करने के लिए प्रेरित हुई हैं। उन्होंने कहा कि पहले कई स्थानीय कारीगर गुमनाम थे, लेकिन अब सरकारी प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें जिला, राज्य, राष्ट्रीय और यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है।
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