केरल हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना ठोस प्रमाण के किसी महिला के चरित्र पर कीचड़ उछालना “सामाजिक हिंसा का घातक रूप” है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी महिला की उपलब्धियों के बजाय उसकी छवि पर ध्यान देना समाज की “बौद्धिक दरिद्रता” को दर्शाता है।
यह टिप्पणी जस्टिस सी. एस. डायस ने मलयालम अभिनेत्री श्वेता मेनन के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए की।
क्या था मामला?
अभिनेत्री श्वेता मेनन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी पुरानी फिल्मों और विज्ञापनों के कथित अश्लील दृश्यों का प्रकाशन या प्रसारण किया। उनके खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67 और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
हालांकि, अदालत ने पाया कि शिकायत दर्ज कराने का समय संदिग्ध था। कोर्ट के अनुसार, यह शिकायत अभिनेत्री को एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (AMMA) के अध्यक्ष पद के चुनाव से रोकने के उद्देश्य से नामांकन वापसी की अंतिम तिथि से ठीक पहले दर्ज कराई गई थी।
अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने अपने 11 मार्च के आदेश में कहा,
“बिना किसी आधार के किसी महिला के चरित्र को बदनाम करना सामाजिक हिंसा का घातक रूप है। इसका असर लंबे समय तक बना रहता है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ उन्हें आदर्श या ‘संत’ बनाना नहीं है, बल्कि उनकी पहचान, उपलब्धियों और आकांक्षाओं को सम्मान और निष्पक्षता के साथ स्वीकार करना है।
दुर्भावनापूर्ण शिकायत करार
कोर्ट ने शिकायत, रिकॉर्ड और कानूनों का विश्लेषण करते हुए पाया कि आरोप अभिनेत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने के दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से लगाए गए थे। इसी आधार पर FIR को रद्द कर दिया गया।
गौरतलब है कि इस मामले में कोर्ट ने पहले ही अगस्त में जांच पर रोक लगा दी थी और प्रक्रिया में खामियों की ओर इशारा किया था।
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