कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में स्थित ऐतिहासिक लाडले मशक दरगाह परिसर में ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ की पूजा को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। दरगाह प्रबंधन द्वारा महाशिवरात्रि पूजा रोकने की मांग पर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि मामला पहले से कर्नाटक हाई कोर्ट में लंबित है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता सीधे आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट नहीं आ सकते, जबकि मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह कोई ऐसा राष्ट्रीय महत्व का मामला नहीं है जिस पर सीधे सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करे। अदालत की सख्ती के बाद दरगाह प्रबंधन ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसे खारिज माना गया।
‘आर्टिकल 32 का गलत इस्तेमाल न करें’
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाते हुए कहा कि हाई कोर्ट के आदेशों से असहमति होने पर सीधे सुप्रीम कोर्ट आना उचित नहीं है। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भी ऐसे मामलों में सीधे शीर्ष अदालत पहुंचने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए थे।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला कलबुर्गी के अलंद क्षेत्र में स्थित 14वीं सदी की लाडले मशक दरगाह से जुड़ा है, जो सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी की याद में बनी है। दरगाह परिसर में 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य की समाधि भी मौजूद है, जिसे हिंदू पक्ष ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ मानता है। वर्षों से दोनों समुदाय यहां अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करते आए हैं।
2022 में शिवलिंग पर कथित तौर पर गंदगी फेंके जाने की घटना के बाद विवाद तेज हो गया और दोनों पक्ष अपने धार्मिक अधिकारों को लेकर अदालत पहुंच गए।
वक्फ संपत्ति और कानूनी दलीलें
दरगाह प्रबंधन की ओर से वरिष्ठ वकील विभा दत्ता मखीजा ने दलील दी कि वक्फ ट्रिब्यूनल पहले ही इस स्थल को वक्फ संपत्ति घोषित कर चुका है। उनका कहना था कि हाई कोर्ट द्वारा पूजा की अनुमति देने से स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव हो सकता है, जो प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 के खिलाफ है।
हाई कोर्ट का आदेश और वर्तमान स्थिति
फरवरी 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष को राहत देते हुए 15 श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर सीमित समय और सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूजा करने की अनुमति दी थी। प्रशासन ने दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग समय तय किया था।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद स्पष्ट हो गया है कि इस विवाद का अंतिम फैसला अब कर्नाटक हाई कोर्ट और वक्फ ट्रिब्यूनल की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।
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