उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और सिराथू विधायक पूजा पाल के बीच शुरू हुई जुबानी जंग अब महिलाओं के सम्मान, जातीय प्रतिनिधित्व और सोशल मीडिया पर राजनीतिक ट्रोलिंग के मुद्दे तक पहुँच गई है। पूजा पाल की एक पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर उनके विरुद्ध की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर समाजवादी पार्टी समर्थकों पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
इस विवाद के बीच सपा की पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. रोली तिवारी मिश्रा और भाजपा नेता डॉ. ऋचा राजपूत से जुड़े पुराने सोशल मीडिया विवाद भी दोबारा चर्चा में आ गए हैं। इन घटनाओं का हवाला देते हुए आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व अपने नाम और तस्वीर का इस्तेमाल करने वाले अभद्र सोशल मीडिया अकाउंट्स के विरुद्ध स्पष्ट कार्रवाई क्यों नहीं करता।
हालाँकि, सोशल मीडिया पर किसी समर्थक या अनधिकृत अकाउंट की टिप्पणी को सीधे किसी राजनीतिक दल या उसके शीर्ष नेतृत्व का आधिकारिक रुख नहीं माना जा सकता। संबंधित आरोपों पर समाजवादी पार्टी की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना जरूरी होगा।

पूजा पाल ने अखिलेश यादव को दिया जवाब
ताजा विवाद पूजा पाल की उस X पोस्ट के बाद बढ़ा, जिसमें उन्होंने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को टैग करते हुए भाजपा में मिलने वाले अवसरों और पाल समाज की राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा उठाया।
पूजा पाल ने लिखा कि उन्हें पाल समाज की बेटी और भाजपा की सदस्य होने पर गर्व है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा में सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी अपनी क्षमता के आधार पर प्रधानमंत्री सहित किसी भी संवैधानिक पद तक पहुँच सकता है। पूजा पाल की यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
उन्होंने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वहाँ कुछ प्रभावशाली परिवारों और नेताओं के अतिरिक्त अन्य सामाजिक समूहों के लिए आगे बढ़ने की संभावनाएँ सीमित रही हैं। पूजा पाल के इस बयान के बाद उनके समर्थकों और सपा समर्थक सोशल मीडिया अकाउंट्स के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।
श्री अखिलेश यादव जी, आप पूछ रहे थे कि मुझे क्या मिला?
आज आपके प्रश्न का जवाब देती हूं।
अखिलेश जी, मुझे गर्व है कि मैं पाल समाज की बेटी हूं और भाजपाई हूं। मैं उस पार्टी में हूं जहां चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। ये मेरी क्षमता पर निर्भर करता है।
अखिलेश जी, मैं उस पार्टी…
— पूजा पाल (@poojaplofficial) July 17, 2026
पूजा पाल के समर्थकों का आरोप—राजनीतिक सवाल का जवाब निजी हमलों से दिया गया
पूजा पाल के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक हिस्सेदारी से जुड़ा सवाल उठाया था, लेकिन जवाब में उनके विरुद्ध व्यक्तिगत, जातिगत और महिला विरोधी टिप्पणियाँ की गईं।
आलोचकों के अनुसार, किसी महिला नेता की राजनीतिक बात का उत्तर उसके चरित्र, निजी जीवन या जातीय पहचान पर टिप्पणी करके देना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि राजनीतिक दल अपने समर्थकों की ऑनलाइन गतिविधियों और भाषा को लेकर कितने जवाबदेह हैं।
रोली तिवारी मिश्रा का मामला फिर चर्चा में
समाजवादी पार्टी की पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. रोली तिवारी मिश्रा पहले भी आरोप लगा चुकी हैं कि पार्टी से जुड़े होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें सोशल मीडिया और निजी संदेशों में धमकियाँ तथा अभद्र गालियाँ दी थीं।
रोली तिवारी ने श्रीरामचरितमानस और सनातन धर्म से संबंधित मुद्दों पर पार्टी लाइन से अलग राय रखी थी। बाद में उनका समाजवादी पार्टी से अलगाव हो गया। उन्होंने आरोप लगाया था कि सपा में रहते हुए जब उन्होंने अपमानजनक संदेशों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की बात कही, तो उन्हें उचित समर्थन नहीं मिला।
श्री @yadavakhilesh जी आपकी DP लगाकर किये गए इस गुंडे के मैसेज को ध्यान से पढ़ियेगा और सोंचियेगा ये मैसेज़ आपकी बेटियों टीना और अदिति को किया गया है फिर बताइयेगा कि आपको कैसा लग रहा है ??
अगर बुरा लगे तो अपनी पार्टी में पल रहे गुंडों पर अंकुश लगाइये
अगर आप की पार्टी के ये गुंडे… pic.twitter.com/Y3OaEFWE8r
— Roli Tiwari Mishra सनातनी डॉ रोली तिवारी मिश्रा (@RoliTiwariMish1) April 30, 2023
उन्होंने अखिलेश यादव को संबोधित करते हुए यह सवाल भी उठाया था कि उनके नाम और तस्वीर का उपयोग करने वाले लोग महिलाओं को धमकियाँ दे रहे हैं, तो पार्टी नेतृत्व उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा।
इन आरोपों की स्वतंत्र और पूर्ण पुष्टि उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन्हें रोली तिवारी मिश्रा के आरोप और उनके सोशल मीडिया दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अखिलेश यादव जी का एक सलाहकार है
वही 2016-2016 की लड़ाई का सूत्रधार है
जाति से ठाकुर है
जब मैं सपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता थी
और मुझे सपाई हिस्ट्रीशीटर मनुरोजन यादव ने गालियाँ दीं तो मैंने उसे बोला कि ये सब बर्दाश्त नहीं है मैं FIR करूँगी
तो उसने कहा
सपा में राजनीति करनी है तो… pic.twitter.com/PNnjyE8Hd7
— Roli Tiwari Mishra सनातनी डॉ रोली तिवारी मिश्रा (@RoliTiwariMish1) June 17, 2026
ऋचा राजपूत के खिलाफ विवादित पोस्ट का मामला
भाजपा नेता डॉ. ऋचा राजपूत और समाजवादी पार्टी से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल के बीच हुआ पुराना विवाद भी एक बार फिर सामने आया है। आरोप है कि ऋचा राजपूत के खिलाफ ऐसे शब्दों और उपमाओं का इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें महिला विरोधी और द्विअर्थी बताया गया।
विवाद के दौरान कथित पोस्ट में धार्मिक पात्रों की उपमाओं के साथ कई व्यक्तिगत टिप्पणियाँ की गई थीं। भाजपा नेताओं ने इसे एक महिला डॉक्टर और राजनीतिक कार्यकर्ता का अपमान बताते हुए समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से जवाब माँगा था।
इस प्रकरण का संबंध सपा सोशल मीडिया कार्यकर्ता मनीष जगन अग्रवाल से जुड़े विवाद से भी जोड़ा गया था। हालाँकि, यह तय करने के लिए कि कौन-सी पोस्ट अधिकृत पार्टी निर्देश पर की गई थी और कौन-सी किसी व्यक्तिगत सोशल मीडिया संचालक की गतिविधि थी, संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तथा पार्टी की प्रतिक्रिया आवश्यक है।
जिस मनीष जगन को बचाने अखिलेश डीजीपी मुख्यालय से जेल के चक्कर लगा रहे है वो इन ट्वीट का समर्थन भी कर रहे है ? pic.twitter.com/QZI5Ray3K6
— Dr. Richa Rajpoot (Lodhi) (@doctorrichabjp) January 8, 2023
राजनीतिक ट्रोलिंग में महिलाओं को क्यों बनाया जाता है निशाना?
भारतीय राजनीति में महिला नेताओं को केवल उनकी नीतियों या बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जाति, पहनावे, परिवार, चरित्र और निजी संबंधों को लेकर भी निशाना बनाया जाता रहा है।
सोशल मीडिया पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के अध्ययन बताते हैं कि प्रभावशाली और वैचारिक रूप से ध्रुवीकृत अकाउंट्स को अधिक रीट्वीट तथा फॉलोअर मिल सकते हैं। इससे तीखी, आक्रामक और अपमानजनक राजनीतिक सामग्री को प्रोत्साहन मिलने का खतरा बढ़ जाता है।
ऐसी ट्रोलिंग केवल एक दल तक सीमित नहीं है। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से जुड़े या उनका समर्थन करने वाले सोशल मीडिया समूहों पर समय-समय पर महिला नेताओं, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के विरुद्ध आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं।
इसके बावजूद, किसी पार्टी के आधिकारिक या प्रभावशाली हैंडल से ऐसी भाषा का प्रयोग अधिक गंभीर माना जाता है, क्योंकि उससे कार्यकर्ताओं और समर्थकों को गलत संदेश मिल सकता है।
मुलायम सिंह यादव का पुराना बयान भी बना राजनीतिक हथियार
इस बहस के दौरान समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का वर्ष 2014 का विवादित बयान भी फिर उद्धृत किया जा रहा है। मुरादाबाद की एक रैली में बलात्कार के दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा था कि लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं। उस समय उनके बयान की व्यापक आलोचना हुई थी।
राजनीतिक विरोधी इस पुराने बयान को समाजवादी पार्टी की महिला संबंधी सोच से जोड़ते हैं। हालाँकि, किसी एक नेता के पुराने बयान के आधार पर पूरी पार्टी और उसके प्रत्येक सदस्य की वर्तमान सोच तय करना भी उचित नहीं होगा।
अखिलेश यादव की चुप्पी पर उठे सवाल
पूजा पाल, रोली तिवारी और ऋचा राजपूत के मामलों का उल्लेख करते हुए सपा विरोधी नेता अखिलेश यादव की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब कोई सोशल मीडिया अकाउंट अखिलेश यादव की तस्वीर या पार्टी के नाम का इस्तेमाल करते हुए महिलाओं के विरुद्ध अभद्र टिप्पणी करता है, तब राष्ट्रीय अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा की निंदा करनी चाहिए।
वहीं, समाजवादी पार्टी के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रत्येक अकाउंट या व्यक्ति के बयान की जिम्मेदारी पार्टी नेतृत्व पर नहीं डाली जा सकती। इस मुद्दे पर सपा का आधिकारिक और विस्तृत पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
महिलाओं के सम्मान पर सभी दलों की परीक्षा
यह विवाद केवल समाजवादी पार्टी या भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मूल प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राजनीतिक दल महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक और यौन संकेतों वाली ऑनलाइन भाषा पर समान मानदंड अपनाने को तैयार हैं।
यदि कोई टिप्पणी विरोधी दल की महिला नेता के खिलाफ की जाती है, तो भी उसका उतना ही स्पष्ट विरोध होना चाहिए जितना अपने दल की महिला नेता के विरुद्ध टिप्पणी का किया जाता है।
लोकतंत्र में तीखी आलोचना, वैचारिक मतभेद और राजनीतिक व्यंग्य स्वीकार्य हैं, लेकिन किसी महिला की जाति, चरित्र या निजी जीवन पर अश्लील हमला लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा नहीं हो सकता।
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