आज यानी 11 अक्टूबर को भारत के महान समाजसेवी, राष्ट्रभक्त और ग्रामीण विकास के प्रतीक भारत रत्न नानाजी देशमुख की जयंती है। उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह सेवा, शिक्षा और समाज सुधार के लिए समर्पित कर दिया। नानाजी ने दिखाया कि सत्ता का पद नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में बदलाव लाना ही सच्चा धर्म है। उनके विचार और कार्य आज भी इस बात की प्रेरणा देते हैं कि मजबूत गांवों से ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण संभव है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
नानाजी देशमुख का पूरा नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभणी जिले के कडोली गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें समाज के लिए कुछ करने की भावना थी। किशोरावस्था में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए। बाद में वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए। राजनीति में ऊंचे पदों तक पहुँचने के बावजूद उन्होंने सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का मार्ग चुना।
Paying homage to the great Nanaji Deshmukh on his birth anniversary. He was a visionary social reformer, nation builder and lifelong advocate of self-reliance and rural empowerment. His life was an embodiment of dedication, discipline and service to society. pic.twitter.com/uNbmTOHc2v
— Narendra Modi (@narendramodi) October 11, 2025
संघ से जुड़ाव और संघर्ष के दिन
संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने उन्हें संगठन से जोड़ा, जबकि माधवराव गोलवलकर (गुरुजी) ने उन्हें उत्तर प्रदेश में प्रचारक के रूप में भेजा। आगरा और गोरखपुर में उन्होंने प्रचारक के रूप में काम किया। उन दिनों संघ की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी — नानाजी जिस धर्मशाला में रहते थे, वहां उन्हें हर तीसरे दिन कमरा बदलना पड़ता था। बाद में एक कांग्रेसी नेता ने इस शर्त पर उनके लिए कमरे की व्यवस्था की कि वे उनका खाना बनाया करेंगे।+

संघर्ष और आंदोलन
नानाजी देशमुख ने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। एक बार पटना में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान उन्होंने जयप्रकाश नारायण को बचाते हुए खुद वार झेला और उनका हाथ टूट गया।
महान राष्ट्रवादी चिंतक और जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक नानाजी देशमुख जी ने युवाओं को संगठित कर राष्ट्रनिर्माण के कार्यों से जोड़ने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। शासन के केंद्र में ‘राष्ट्रप्रथम’ को सर्वोपरि मानने वाली विचारशक्ति की नींव को मजबूत बनाने वाले नानाजी आजीवन… pic.twitter.com/uQMCuOob2J
— Amit Shah (@AmitShah) October 11, 2025
राजनीति से संन्यास और सेवा का मार्ग
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वे आसानी से मंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता की बजाय संगठन को चुना। उन्होंने अपने स्थान पर ब्रेजलाल वर्मा को मंत्री बनवाया और खुद जनता पार्टी के महामंत्री बने। इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर ग्राम विकास को अपना जीवन-ध्येय बना लिया।
चित्रकूट मॉडल और ग्राम विकास
नानाजी देशमुख का मानना था — “गांव मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा।” इसी विचार से उन्होंने मध्य प्रदेश के चित्रकूट में दीनदयाल शोध संस्थान (Deendayal Research Institute) की स्थापना की। यहां उन्होंने ‘एक ग्राम, एक योजना’ के सिद्धांत पर आधारित चित्रकूट मॉडल विकसित किया, जो पाँच स्तंभों — शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महिला सशक्तिकरण और रोजगार — पर टिका था। उनके प्रयासों से चित्रकूट और आसपास के कई गांव आत्मनिर्भर बन गए और ग्रामीण विकास का आदर्श उदाहरण बने।
देहदान और अंतिम यात्रा
27 फरवरी 2010 को नानाजी देशमुख का निधन उनकी कर्मभूमि चित्रकूट में हुआ। उन्होंने जीवनकाल में ही देहदान का संकल्प लिया था, और उनके निधन के बाद उनका शरीर चिकित्सा विज्ञान संस्थान को दान कर दिया गया।
सम्मान और विरासत
नानाजी देशमुख को उनके अद्वितीय योगदान के लिए 1999 में पद्म विभूषण और 2019 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
उनका जीवन संदेश देता है कि – “सेवा ही सर्वोच्च साधना है।”
नानाजी आज भी देशभर में उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो सत्ता नहीं, समाज की सेवा को जीवन का उद्देश्य मानते हैं।