पश्चिम एशिया में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की आशंका गहराती दिख रही है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य जमावड़ा शुरू कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, फाइटर जेट्स और एडवांस एंटी-मिसाइल सिस्टम की तैनाती तेज की जा रही है। इसी बीच इजरायल ने भी अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को अलर्ट मोड पर रख दिया है और हालात पर करीबी नजर बनाए हुए है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब ईरान में देशव्यापी प्रदर्शनों, हिंसा, मौतों के आंकड़ों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ नाम की एक पहल लॉन्च की, जिसे वैश्विक स्थिरता और शांति के लिए बताया गया। हालांकि इसके महज 24 घंटे के भीतर ही ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य बल के इस्तेमाल की बात फिर दोहरा दी।
A U.S. Air Force F-15E Strike Eagle assigned to the 494th Expeditionary Fighter Squadron lands at a base in the Middle East, Jan. 18. The F-15's presence enhances combat readiness and promotes regional security and stability. pic.twitter.com/QTXgOsOozV
— U.S. Central Command (@CENTCOM) January 20, 2026
ट्रंप इससे पहले भी ईरान में प्रदर्शनकारियों की मौतों को लेकर सैन्य कार्रवाई की धमकी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी दबाव के चलते ईरान को “हजारों लोगों” को फांसी देने की योजना रोकनी पड़ी। गुरुवार को उन्होंने कहा कि उनकी चेतावनियों के बाद ईरान ने करीब 840 फांसी रोक दीं, हालांकि बाद में उन्होंने अपना लहजा कुछ नरम किया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह ट्रंप की रणनीति का हिस्सा है, जिसमें दबाव और धमकी के साथ-साथ कूटनीतिक “ऑफ-रैंप” भी छोड़ा जाता है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, USS Abraham Lincoln की अगुवाई वाला एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर आने वाले दिनों में अरब सागर या फारस की खाड़ी में प्रवेश कर सकता है। इसे तेहरान पर दबाव बढ़ाने के कदम के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्ट्राइक ग्रुप की आखिरी पुष्टि की गई लोकेशन तीन दिन पुरानी है। पहले यह साउथ चाइना सी में था, लेकिन पश्चिम की ओर मोड़े जाने के बाद यह इंडियन ओशन क्षेत्र में देखा गया, जिसके बाद यह ओपन-सोर्स ट्रैकिंग सिस्टम से गायब हो गया। इस समूह में एक अटैक सबमरीन के शामिल होने की भी खबर है।

इसके साथ ही अमेरिकी F-15E स्ट्राइक ईगल फाइटर जेट्स पहले से पश्चिम एशिया में तैनात हैं। ये उसी स्क्वाड्रन से हैं, जिन्हें अप्रैल 2024 में इजरायल पर ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों के जवाब में तैनात किया गया था। US सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें एक विमान किसी अज्ञात एयरबेस पर उतरता दिख रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह तैनाती एक बड़े री-डिप्लॉयमेंट का हिस्सा है, जिसमें KC-135 एरियल रिफ्यूलिंग टैंकर भी शामिल हैं, ताकि फाइटर जेट्स की स्ट्राइक रेंज बढ़ाई जा सके। इसके अलावा THAAD और Patriot जैसे अतिरिक्त एंटी-मिसाइल सिस्टम भी क्षेत्र में तैनात किए जा रहे हैं, खासतौर पर इजरायल और कतर जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए।
यह पूरा सैन्य जमावड़ा ऐसे समय पर हो रहा है, जब ईरान में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शन और हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन झड़पों में 3,117 लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में नागरिक और सुरक्षा बल शामिल बताए गए हैं। वहीं मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा, संभवतः 20,000 से ऊपर हो सकता है।
ट्रंप ने इन मौतों को लेकर ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए सैन्य कार्रवाई की धमकी दोहराई है। उन्होंने पहले यह भी कहा था कि अगर ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू किया तो अमेरिका कार्रवाई करेगा। इसी बीच ईरान ने भी तीखे बयान दिए हैं। ईरानी नेतृत्व ने कहा है कि उसकी “उंगली ट्रिगर पर” है और उसने अमेरिका व इजरायल पर प्रदर्शनों को भड़काने का आरोप लगाया है।

रिपोर्ट में तनाव बढ़ने की एक बड़ी वजह ईरान के पास मौजूद करीब 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम का “लापता” होना बताया गया है, जिसे लगभग 10 परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त माना जाता है। जून 2025 में अमेरिकी “बंकर बस्टर” हमलों के बाद इस स्टॉकपाइल की स्थिति को लेकर सवाल उठे हैं। IAEA निरीक्षण अब तक नहीं हो पाया है, जबकि एजेंसी के दिशा-निर्देश नियमित जांच की सलाह देते हैं।
सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, संभावित अमेरिकी कार्रवाई कई चरणों में हो सकती है। इसमें सीमित “दंडात्मक” स्ट्राइक से लेकर मिसाइल और ड्रोन नेटवर्क को निशाना बनाना, और अंततः परमाणु ठिकानों पर हमले की संभावना शामिल है। हालांकि रेजीम चेंज को असंभव माना जा रहा है, क्योंकि इससे अमेरिका लंबे और महंगे युद्ध में फंस सकता है।
अगर अमेरिका हमला करता है तो इजरायल की भूमिका अहम मानी जा रही है, चाहे वह सीधे शामिल हो या नहीं। इजरायल का मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम—Iron Dome और Arrow—क्षेत्र में नुकसान सीमित करने में महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि गाज़ा में पहले से जारी संघर्ष के चलते इजरायल के लिए बहु-फ्रंट युद्ध का जोखिम काफी बढ़ सकता है।
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