छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रभाव पर बड़ा प्रहार करते हुए गोगुंडा क्षेत्र के जंगलों में बने कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना के 20 फीट ऊंचे स्मारक को ध्वस्त कर दिया। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 74वीं बटालियन द्वारा की गई इस कार्रवाई को बस्तर क्षेत्र से नक्सलवाद के समूल खात्मे की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
CRPF के अनुसार, गोगुंडा इलाका लंबे समय तक माओवादियों का मजबूत गढ़ रहा है और सुरक्षा बलों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण तथा अलग-थलग क्षेत्र था। 74वीं बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट विदेखो किये ने बताया कि 20 नवंबर 2025 को यहां फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित किया गया, जिसके बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है। अब स्थानीय लोगों के लिए बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं।
#WATCH | Sukma, Chhattisgarh | Assistant Commandant of 74th Battalion Videkho Kiye says, "This area in Gogunda had been under naxal control for a long time and was a cutoff area for the security forces… But the 74th Battalion has established a forward operating base on November… pic.twitter.com/Ge7tZvniW1
— ANI (@ANI) February 4, 2026
ध्वस्त किया गया स्मारक माओवादी संगठन की केंद्रीय कमेटी के कुख्यात नेता रमन्ना का था, जो तेलंगाना के वारंगल का रहने वाला था। रमन्ना ने तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में माओवादी गतिविधियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी और उस पर कुल करीब 2.40 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। दिसंबर 2019 में उसकी मौत की खबर सामने आई थी, लेकिन संगठन ने उसके नाम पर स्मारक बनाकर डर और विचारधारा को जीवित रखने की कोशिश की थी।
CRPF की 74वीं बटालियन ने एंटी-नक्सल ऑपरेशन के दौरान इस ढांचे की पहचान की और कमांडेंट हिमांशु पांडे के निर्देश पर कार्रवाई की गई। सुरक्षा बलों ने पहले पूरे इलाके की गहन तलाशी ली, सुरक्षा घेरा मजबूत किया और संभावित माओवादी प्रतिक्रिया से निपटने की तैयारी सुनिश्चित की। इसके बाद विस्फोटक के जरिए स्मारक को पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया।
गोगुंडा क्षेत्र, जो कभी माओवादियों का मजबूत ठिकाना माना जाता था, अब सुरक्षा बलों के नियंत्रण में आता दिख रहा है। स्थायी सुरक्षा कैंप और लगातार सर्च ऑपरेशन के चलते माओवादियों की गतिविधियां सीमित हुई हैं और उनकी पकड़ कमजोर पड़ती जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां 31 मार्च 2026 तक बस्तर क्षेत्र को पूरी तरह नक्सलमुक्त बनाने के लक्ष्य के साथ अभियान चला रही हैं।
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