छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए बाहरी पादरियों और ईसाई मिशनरियों के प्रवेश प्रतिबंध को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्राम सभाओं को अपनी संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि स्थानीय ग्राम सभाएं PESA एक्ट 1996 के तहत अपनी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए निर्णय ले सकती हैं। कोर्ट ने माना कि जबरन, लालच या धोखाधड़ी के जरिए धर्मांतरण रोकने के उद्देश्य से लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला किसी धर्म विशेष की स्वतंत्रता को सीमित करने का नहीं बल्कि जनजातीय परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। यदि सांस्कृतिक संरक्षण के लिए बाहरी हस्तक्षेप को नियंत्रित करना जरूरी हो, तो ग्राम सभाएं ऐसा कर सकती हैं।
किस मामले में हुई सुनवाई
यह मामला कांकेर जिले के आठ जनजातीय गांवों — कुडल, परवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी — से जुड़ा है, जहां ग्राम सभाओं ने प्रस्ताव पारित कर बाहरी पादरियों और कुछ ‘बाहरी व्यक्तियों’ के प्रवेश पर रोक लगाने वाले होर्डिंग्स लगाए थे।
Supreme Court hears plea against Chhattisgarh High Court order which observed that alleged missionary-led conversions of poor and tribal populations through “inducement” and “manipulation” disturb social harmony and cultural identity.
Bench: Justices Vikram Nath and Sandeep… pic.twitter.com/mdzYSZNxZ5
— Bar and Bench (@barandbench) February 16, 2026
याचिकाकर्ता दिगबल टांडी ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर दावा किया था कि ये प्रतिबंध संविधान के आर्टिकल 14, 19(1)(d) और 25 का उल्लंघन करते हैं और ईसाई समुदाय के साथ भेदभाव है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इससे सामाजिक तनाव और बहिष्कार की स्थिति पैदा हो रही है।
हाई कोर्ट का फैसला क्या था
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने पहले ही फैसला देते हुए कहा था कि जबरन धर्मांतरण के खिलाफ चेतावनी देने वाले बैनर लगाना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।
SG Mehta: don’t argue beyond pleadings before the High Court.
Gonsalves: there was a difference of opinion on that. There’s a third petition coming up on Wednesday before this court. Where the tribals who are buried in the village, their bodies are being dug out. There is not a…
— Bar and Bench (@barandbench) February 16, 2026
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि लालच या दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन सामाजिक तनाव और जनजातीय समुदायों में ध्रुवीकरण का कारण बन सकता है। ऐसे में ग्राम सभाओं के निर्णय को अवैध नहीं माना जा सकता।
PESA एक्ट के तहत ग्राम सभाओं के अधिकार
कोर्ट ने माना कि PESA Act 1996 जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को स्थानीय परंपराओं, संसाधनों और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए विशेष अधिकार देता है। इसलिए बाहरी हस्तक्षेप को नियंत्रित करने के निर्णय को कानूनी रूप से उचित माना गया।
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