राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारत का विकास केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य दुनिया को सुख और संतुलन का मार्ग दिखाना है। उन्होंने विकसित देशों के उस विकास मॉडल की आलोचना की, जिसमें प्रगति के साथ-साथ विनाश भी जुड़ गया है। भागवत ने कहा कि भारत का रास्ता अलग है, जहां विज्ञान और धर्म में कोई टकराव नहीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
आंध्र प्रदेश में आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत का आगे बढ़ना तय है और भारत को विश्व को कुछ देने के लिए आगे आना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का विकास केवल स्वयं को आगे बढ़ाने के लिए नहीं है। उन्होंने कहा कि आज कई विकसित देश यह महसूस कर रहे हैं कि उन्होंने भौतिक विकास तो कर लिया, लेकिन कहीं न कहीं चूक गए, क्योंकि विकास का अंतिम उद्देश्य सुख होता है और वही संतुलन बिगड़ गया।
#WATCH | तिरुपति, आंध्र प्रदेश | आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "…हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ज्ञान हर किसी तक पहुंचे।
मातृभाषा में सीखना बहुत प्रभावशाली होता है।
विज्ञान के ज्ञान को भारत की विभिन्न भाषाओं में आम आदमी तक पहुंचाना चाहिए…"#MohanBhagwat #RSS… pic.twitter.com/XFgGnzMrNI
— One India News (@oneindianewscom) December 26, 2025
संघ प्रमुख ने कहा कि मनुष्य और सृष्टि के सभी प्राणियों को सुख चाहिए। इसी सुख की खोज में मनुष्य विज्ञान की ओर बढ़ता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सूरज कितनी दूर है, यह जानने से सीधे जीवन पर कोई फर्क न भी पड़े, फिर भी इंसान जानना चाहता है, क्योंकि सत्य की खोज मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है।
मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि विज्ञान और धर्म के बीच कोई संघर्ष नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों अलग-अलग मार्गों से चलकर एक ही लक्ष्य तक पहुंचते हैं, और वह लक्ष्य है सत्य की खोज। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म को अक्सर मजहब के रूप में गलत समझ लिया जाता है, जबकि असल में धर्म सृष्टि के संचालन का विज्ञान है।
उन्होंने कहा, “धर्म कोई मजहब नहीं है। यह वह नियम है जिसके अनुसार सृष्टि चलती है। कोई इसे माने या न माने, लेकिन इसके बाहर कोई भी काम नहीं कर सकता।” भागवत ने चेतावनी दी कि धर्म में असंतुलन ही अंततः विनाश का कारण बनता है।
RSS प्रमुख ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक रूप से विज्ञान ने यह मानते हुए धर्म से दूरी बना ली कि वैज्ञानिक अनुसंधान में उसका कोई स्थान नहीं है, लेकिन यह सोच गलत है। उनके अनुसार विज्ञान और अध्यात्म में वास्तविक अंतर केवल कार्यप्रणाली का है, लक्ष्य का नहीं।
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने दोहराया कि विज्ञान और धर्म या अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनकी पद्धतियां भले ही अलग हों, लेकिन मंज़िल एक ही है—सत्य की खोज।
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