बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची में किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को न केवल मनमाना बल्कि असंवैधानिक भी बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिस पर आज यानी 10 जुलाई 2025 को सुनवाई होनी है। इस याचिका में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा सहित कई विपक्षी दल शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने 24 जून को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की घोषणा करते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन बनाना है, ताकि सभी पात्र मतदाताओं को शामिल किया जा सके और अपात्र या फर्जी नामों को हटाया जा सके। आयोग ने इस कदम को तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, जनसंख्या प्रवासन, 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाताओं का समावेश और मौतों की कम रिपोर्टिंग के चलते ज़रूरी बताया। इसके अलावा आयोग ने यह भी कहा कि अवैध विदेशी नागरिकों के वोटर लिस्ट में शामिल हो जाने की आशंका के चलते यह प्रक्रिया आवश्यक हो गई थी।
हालांकि विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया आम चुनावी परंपरा से हटकर है और पहली बार पूरे राज्य के सभी मतदाताओं से फिर से अपनी पात्रता सिद्ध करने की मांग की जा रही है। इससे उन गरीब और वंचित तबकों को सबसे ज़्यादा नुकसान होगा, जिनके पास सभी ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं हैं — जैसे ग्रामीण, दलित, अल्पसंख्यक और प्रवासी समुदाय। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए चुनावी लाभ उठाने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर वैध मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा सकता है, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
इस बीच निर्वाचन आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि 1 अगस्त तक ड्राफ्ट मतदाता सूची तैयार की जाएगी और उसके बाद आपत्तियों को स्वीकार कर समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया चलाई जाएगी। आयोग के अनुसार, वर्तमान में मतदाता सूची में 7.9 प्रतिशत ऐसे नाम हैं जिन पर पुनः जांच की आवश्यकता है, और इनमें से 57 प्रतिशत लोगों ने पहले ही नए फॉर्म जमा कर दिए हैं, जिनकी अब जांच की जा रही है।
इस पूरी प्रक्रिया ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को जन्म दिया है कि क्या चुनाव से ठीक पहले इस प्रकार की व्यापक पुनरीक्षण प्रक्रिया उचित और वैध है। सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या इस प्रक्रिया को स्थगित किया जाएगा या इसे वैधानिक मान्यता मिलेगी। यह फैसला बिहार ही नहीं, बल्कि देशभर में मतदाता सूची संशोधन की नीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।