प्राचीन भारत के महान शल्य चिकित्सक महर्षि सुश्रुत की 90 किलोग्राम वजनी काँस्य प्रतिमा का यूनाइटेड किंगडम के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में अनावरण किया गया है। आधुनिक शल्य चिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी के प्रारंभिक प्रवर्तकों में गिने जाने वाले महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा कॉलेज के ऐतिहासिक प्लेफेयर हॉल में स्थापित की गई है।
इस पहल को भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा, आयुर्वेद और ‘सुश्रुत संहिता’ के वैश्विक योगदान को सम्मानित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रतिमा को रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग के हेरिटेज कलेक्शन में शामिल किया गया है।
19 जून को हुआ प्रतिमा का अनावरण
उपलब्ध जानकारी के अनुसार महर्षि सुश्रुत की काँस्य प्रतिमा का अनावरण शुक्रवार, 19 जून 2026 को स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग में किया गया। इस समारोह में चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद और भारत-स्कॉटलैंड संबंधों से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोगों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में एडिनबर्ग स्थित भारत के कॉन्सुल जनरल सिद्धार्थ मलिक ने प्रतिमा का अनावरण किया। भारतीय वाणिज्य दूतावास ने कहा कि समारोह में भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत, चिकित्सा और सर्जरी के क्षेत्र में ऐतिहासिक भारत-स्कॉटलैंड संबंधों तथा वैश्विक सर्जिकल शिक्षा में रॉयल कॉलेज की भूमिका को रेखांकित किया गया।
🏛️🇮🇳🇬🇧 एडिनबर्ग के Royal College of Surgeons of Edinburgh में महान भारतीय वैद्य और शल्य चिकित्सा के जनक Sushruta की प्रतिमा का अनावरण किया गया।
यह भारत और यूके के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है, जो भारतीय चिकित्सा विरासत को वैश्विक सम्मान दिलाता है।… pic.twitter.com/Bf95gQtSQh
— One India News (@oneindianewscom) June 22, 2026
दुनिया के सबसे पुराने सर्जिकल कॉलेज में सुश्रुत की प्रतिमा
रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की स्थापना वर्ष 1505 में हुई थी। इसे दुनिया का सबसे पुराना सर्जिकल कॉलेज माना जाता है। संस्थान से 140 से अधिक देशों के 33 हजार से ज्यादा चिकित्सा और शल्य चिकित्सा पेशेवर जुड़े हुए हैं।
कॉलेज दुनिया भर में सर्जिकल और डेंटल शिक्षा, प्रशिक्षण, परीक्षाओं, रोगी सुरक्षा और चिकित्सा मानकों को बेहतर बनाने के लिए काम करता है। ऐसे ऐतिहासिक संस्थान में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित होना भारतीय चिकित्सा इतिहास के लिए विशेष उपलब्धि माना जा रहा है।
प्रोफेसर चंद्र चेरुवु ने की पहल
महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित करने की पहल ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय मूल के सर्जन प्रोफेसर चंद्र चेरुवु और उनके परिवार ने की। प्रोफेसर चेरुवु बैरियाट्रिक, अपर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के विशेषज्ञ हैं।
रॉयल कॉलेज के अनुसार चेरुवु परिवार का आयुर्वेद और चिकित्सा से कई पीढ़ियों पुराना संबंध रहा है। प्रोफेसर चेरुवु की दादी चेरुवु सौभाग्यम्मा परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही आयुर्वेदिक उपचार परंपराओं का अभ्यास करती थीं।
उनके पिता डॉक्टर चेरुवु सुब्रह्मण्य शास्त्री ने भी पहले पारंपरिक भारतीय चिकित्सा का अध्ययन किया और बाद में आधुनिक चिकित्सा तथा जनरल सर्जरी की शिक्षा हासिल की। चेरुवु परिवार ने इसी चिकित्सा विरासत को सम्मानित करते हुए सुश्रुत की प्रतिमा कॉलेज को प्रदान की।
तमिलनाडु के कलाकार ने तैयार की प्रतिमा
रिपोर्टों के अनुसार 90 किलोग्राम की इस काँस्य प्रतिमा को तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई के एक कलाकार ने तैयार किया है। प्रतिमा में महर्षि सुश्रुत को एक प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ के साथ दिखाया गया है।
प्रतिमा को कॉलेज के ऐतिहासिक प्लेफेयर हॉल में रखा गया है, जहाँ यह दुनिया भर से आने वाले डॉक्टरों, सर्जनों, छात्रों और पर्यटकों को प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सा की समृद्ध परंपरा से परिचित कराएगी।
Consul General unveiled the bronze sculpture of Sage Sushruta, revered as the Father of Surgery, at the Royal College of Surgeons of Edinburgh @RCSEd .
The ceremony celebrated India’s ancient medical heritage, the historical India-Scotland links in medicine and surgery, and the… pic.twitter.com/xM59OcKCeM
— India In Scotland (@IndiaInScotland) June 19, 2026
महर्षि सुश्रुत पर पुस्तक का विमोचन
प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर प्रोफेसर चंद्र चेरुवु द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘Maharishi Sushruta: A Compendium – Father of Surgery’ का भी विमोचन किया गया।
इस पुस्तक में महर्षि सुश्रुत के जीवन, उनकी शल्य चिकित्सा पद्धतियों, चिकित्सा शिक्षा, उपकरणों, रोगों के उपचार और आधुनिक सर्जरी के विकास पर उनके प्रभाव से जुड़े साक्ष्यों को संकलित किया गया है।
पुस्तक का उद्देश्य दुनिया के सामने यह प्रस्तुत करना है कि प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा का ज्ञान कितना विकसित था और महर्षि सुश्रुत द्वारा बताई गई कई अवधारणाएँ आज भी चिकित्सा शिक्षा और सर्जिकल प्रशिक्षण के लिए प्रासंगिक हैं।
युवा सर्जनों के लिए चेरुवु प्रोफेशनल डेवलपमेंट ग्रांट
कार्यक्रम के साथ चेरुवु परिवार और रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग ने युवा सर्जनों के लिए ‘चेरुवु प्रोफेशनल डेवलपमेंट ग्रांट’ शुरू करने की भी घोषणा की।
इन अनुदानों का उद्देश्य सर्जरी और ऑर्थोपेडिक सर्जरी से जुड़े योग्य डॉक्टरों को व्यावसायिक प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय अनुभव, ऑब्जर्वरशिप, कॉन्फ्रेंस, लेक्चरशिप, ट्रेनिंग फेलोशिप और अन्य शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने में सहायता देना है।
इस योजना के अंतर्गत दो चयनित आवेदकों को एक-एक हजार पाउंड तक की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। यह पहल महर्षि सुश्रुत की ज्ञान, प्रशिक्षण और व्यावहारिक चिकित्सा शिक्षा की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है।
समारोह में शामिल हुए चिकित्सा जगत के प्रमुख लोग
प्रतिमा अनावरण समारोह में भारत के कॉन्सुल जनरल सिद्धार्थ मलिक, रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की अध्यक्ष प्रोफेसर क्लेयर मैकनॉट, कॉलेज के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर रोवन पार्क्स और कैलिफोर्निया कॉलेज ऑफ आयुर्वेद के संस्थापक प्रोफेसर मार्क हैल्पर्न सहित कई प्रतिष्ठित लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के डॉक्टरों, सर्जनों, शिक्षाविदों तथा भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। समारोह के दौरान भारतीय चिकित्सा परंपराओं और आधुनिक वैश्विक सर्जिकल शिक्षा के बीच संबंधों पर चर्चा की गई।
कौन थे महर्षि सुश्रुत?
महर्षि सुश्रुत प्राचीन भारत के महान चिकित्सक, शल्य चिकित्सक और चिकित्सा शिक्षक थे। इतिहासकार उन्हें लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व का विद्वान मानते हैं। उनका संबंध प्राचीन काशी से बताया जाता है, जो उस समय चिकित्सा और शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
सुश्रुत को भारत में व्यापक रूप से ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ और ‘प्लास्टिक सर्जरी का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने शल्य चिकित्सा को केवल उपचार की अंतिम पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान की एक व्यवस्थित और महत्वपूर्ण शाखा के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने शरीर रचना के अध्ययन, व्यावहारिक प्रशिक्षण, शल्य उपकरणों के उपयोग, घावों के उपचार, हड्डियों की चोट, पथरी निकालने, मोतियाबिंद के उपचार और पुनर्निर्माण सर्जरी जैसी तकनीकों का वर्णन किया।
सुश्रुत संहिता का चिकित्सा इतिहास में महत्व
महर्षि सुश्रुत से संबंधित ‘सुश्रुत संहिता’ आयुर्वेद और प्राचीन शल्य चिकित्सा के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ में रोगों की पहचान, उपचार, औषधियों, शरीर रचना, शल्य उपकरणों और विभिन्न प्रकार की सर्जिकल प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।
चिकित्सा इतिहास से जुड़े अध्ययनों के अनुसार सुश्रुत संहिता में करीब 1,120 रोगों, लगभग 300 शल्य प्रक्रियाओं और 120 से अधिक शल्य उपकरणों का उल्लेख मिलता है।
ग्रंथ में सर्जरी से पहले रोगी की तैयारी, ऑपरेशन के दौरान सावधानी, घाव की सफाई, टाँके लगाने, संक्रमण से बचाव और ऑपरेशन के बाद रोगी की देखभाल जैसे विषयों का भी वर्णन है।
नाक के पुनर्निर्माण की तकनीक का उल्लेख
सुश्रुत संहिता में नाक के पुनर्निर्माण यानी राइनोप्लास्टी की एक प्रारंभिक तकनीक का वर्णन मिलता है। इसमें गाल या शरीर के अन्य हिस्से से त्वचा लेकर क्षतिग्रस्त नाक को दोबारा बनाने की प्रक्रिया बताई गई है।
इस कारण सुश्रुत को प्लास्टिक और पुनर्निर्माण सर्जरी के इतिहास के सबसे प्रारंभिक अग्रदूतों में शामिल किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा इतिहास में भी उनकी राइनोप्लास्टी तकनीक का विशेष उल्लेख किया जाता है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने कान की मरम्मत, हड्डियों और जोड़ों की चोट, मूत्राशय की पथरी, प्रसूति संबंधी जटिलताओं और आँखों से जुड़ी कुछ शल्य प्रक्रियाओं का भी विवरण दिया।
व्यावहारिक प्रशिक्षण पर देते थे विशेष जोर
महर्षि सुश्रुत केवल सैद्धांतिक शिक्षा के बजाय व्यावहारिक प्रशिक्षण को अत्यधिक महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने विद्यार्थियों को वास्तविक सर्जरी से पहले फलों, सब्जियों, चमड़े, कपड़े और अन्य वस्तुओं पर चीरा लगाने, सिलाई करने तथा शल्य उपकरणों का अभ्यास करने की सलाह दी थी।
उन्होंने मानव शरीर की संरचना समझने के लिए शव अध्ययन का भी वर्णन किया। चिकित्सा शिक्षा में अभ्यास, निरीक्षण और अनुभव पर उनका जोर आधुनिक सर्जिकल प्रशिक्षण की कई अवधारणाओं से मेल खाता है।
भारतीय चिकित्सा विरासत को वैश्विक मंच
रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की हेरिटेज निदेशक ने सुश्रुत की प्रतिमा को कॉलेज के संग्रह में महत्वपूर्ण योगदान बताया। उनके अनुसार सुश्रुत प्राचीन भारत में शल्य तकनीक, उपकरणों के इस्तेमाल और सर्जनों के प्रशिक्षण की शिक्षा दे रहे थे।
कॉलेज ने कहा कि प्रतिमा आगंतुकों को यह याद दिलाएगी कि शल्य चिकित्सा का इतिहास किसी एक देश या सभ्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया की कई सभ्यताओं के ज्ञान और अनुभव का परिणाम है।
महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा की स्थापना भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्राचीन योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के साथ युवा चिकित्सकों को चिकित्सा इतिहास और ज्ञान की वैश्विक परंपरा से प्रेरणा लेने का अवसर भी प्रदान करेगी।
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