संसद में परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख Chandrashekhar Azad के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दलितों के लिए ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ यानी अलग निर्वाचक मंडल की माँग की, जिसके तहत ऐसी सीटों का प्रावधान होगा जहाँ केवल दलित उम्मीदवार चुनाव लड़ें और वोट देने का अधिकार भी सिर्फ दलित मतदाताओं को हो।
इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर उनका वीडियो तेजी से वायरल हो गया और इस पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कई आलोचक इस माँग की तुलना Muhammad Ali Jinnah द्वारा 1916 में मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग से कर रहे हैं।
संसद में अपने संबोधन के दौरान आजाद ने दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि वर्तमान व्यवस्था में दलित जनप्रतिनिधि अपनी समुदाय के बजाय राजनीतिक दलों के प्रति अधिक वफादार होते हैं। उन्होंने B. R. Ambedkar और Kanshi Ram की ‘चमचा युग’ अवधारणा का हवाला देते हुए कहा कि जब तक दलितों को अपने प्रतिनिधि चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक वास्तविक सशक्तिकरण संभव नहीं है।
आजाद ने Poona Pact का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इस समझौते ने दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज को सीमित कर दिया।
विवाद और प्रतिक्रियाएँ
इस माँग पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विवाद गहराता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अलग निर्वाचन व्यवस्था को अस्वीकार किया था, क्योंकि इससे समाज में विभाजन की आशंका बढ़ती है। आलोचकों का कहना है कि यह विचार लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है और इससे सामाजिक एकता को नुकसान पहुँच सकता है।
महिला आरक्षण पर भी उठाए सवाल
अपने भाषण में चंद्रशेखर आजाद ने महिला आरक्षण के भीतर भी आरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पूछा कि 33% महिला आरक्षण में एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कोटा क्यों नहीं है। उनका कहना था कि बिना ‘कोटा के भीतर कोटा’ के सबसे वंचित वर्गों की महिलाएँ संसद तक नहीं पहुँच पाएँगी।
नई बहस: न्याय या तुष्टीकरण?
इस बयान के बाद देश में एक नई बहस छिड़ गई है—क्या यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम है या फिर समाज को जाति और धर्म के आधार पर विभाजित करने वाली राजनीति?
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