पश्चिम बंगाल में ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए धार्मिक स्थलों पर लगे तेज आवाज वाले लाउडस्पीकरों के खिलाफ राज्यव्यापी कार्रवाई शुरू की गई है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने निर्धारित ध्वनि-सीमा का उल्लंघन करने वाले तथा बिना आवश्यक अनुमति इस्तेमाल किए जा रहे लाउडस्पीकरों को हटाने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
रिपोर्टों के अनुसार, दो दिनों के भीतर राज्य में कम से कम 1,279 मस्जिदों और 199 मंदिरों से लाउडस्पीकर हटाए गए हैं। सबसे अधिक कार्रवाई उत्तर बंगाल में हुई, जहां मस्जिदों से 1,238 और मंदिरों से 117 लाउडस्पीकर हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। प्रशासन का कहना है कि अभियान किसी एक धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों को समान रूप से लागू करने के लिए चलाया जा रहा है।
मस्जिद कमे टियों से पुलिस ने मांगा सहयोग
राज्य के कई जिलों में पुलिस अधिकारियों ने मस्जिद प्रबंधन समितियों के साथ बैठकें कर निर्धारित सीमा से अधिक आवाज करने वाले लाउडस्पीकर हटाने और नियंत्रित आवाज वाले वैकल्पिक साउंड सिस्टम का इस्तेमाल करने को कहा है।
कुछ मस्जिद समितियों ने प्रशासन की अपील का पालन करते हुए लाउडस्पीकर हटा दिए हैं। हालांकि, कई धार्मिक संगठनों और नेताओं ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने लिखित आदेश या नोटिस दिए बिना मौखिक रूप से उपकरण हटाने का दबाव बनाया।
ISF विधायक नौशाद सिद्दीकी ने DGP को लिखा पत्र
इंडियन सेक्युलर फ्रंट के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक एसएन गुप्ता को पत्र लिखकर कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगा है। दक्षिण 24 परगना की भांगड़ विधानसभा सीट से विधायक सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि अलग-अलग जिलों में पुलिस अधिकारी मस्जिद समितियों से लाउडस्पीकर हटवा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ध्वनि प्रदूषण की कोई शिकायत मिलने पर कानून के अनुसार जांच होनी चाहिए, संबंधित पक्ष को नोटिस दिया जाना चाहिए और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने धार्मिक संस्थानों के विरुद्ध मौखिक आदेश या कथित जबरदस्ती की जांच कराने की मांग भी की है।
सिद्दीकी ने चेतावनी दी कि आवश्यकता पड़ने पर वह इस कार्रवाई को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
नखोदा मस्जिद के इमाम ने उठाए सवाल
कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मुहम्मद शफीक कासमी ने आरोप लगाया कि मस्जिद अधिकारियों से बिना लिखित सरकारी आदेश दिखाए लाउडस्पीकर हटाने को कहा गया।
उन्होंने कहा कि यदि सभी धार्मिक स्थलों के लिए कोई औपचारिक आदेश जारी किया गया है, तो सरकार को इमामों, मंदिर समितियों और अन्य धार्मिक संस्थानों के प्रतिनिधियों को उसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। उन्होंने प्रशासन से टकराव के बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की।
सरकार ने भेदभाव के आरोपों को किया खारिज
पश्चिम बंगाल सरकार ने धार्मिक भेदभाव के आरोपों को खारिज किया है। राज्य की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण से संबंधित नियम मस्जिदों के साथ-साथ मंदिरों और दूसरे सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होंगे।
सरकार का कहना है कि किसी भी धार्मिक स्थल को निर्धारित ध्वनि-सीमा का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। धार्मिक गतिविधियों को रोकना अभियान का उद्देश्य नहीं है; कार्रवाई केवल तेज आवाज, बिना अनुमति सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली और निर्धारित समय के बाहर लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने पर की जा रही है।
क्या हैं लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने के नियम?
पश्चिम बंगाल के पर्यावरण विभाग ने 13 मई 2026 को जारी अधिसूचना में खुले सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन के इस्तेमाल के लिए कई शर्तें निर्धारित की थीं।
नियमों के अनुसार:
- खुले स्थान पर लाउडस्पीकर चलाने से पहले पुलिस की लिखित अनुमति जरूरी है।
- सामान्य परिस्थितियों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल सुबह 6 बजे से रात 10 बजे के बीच किया जा सकता है।
- रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक खुले स्थान पर लाउडस्पीकर चलाने की अनुमति नहीं है।
- आवासीय क्षेत्र में अधिकतम ध्वनि-सीमा दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल है।
- साइलेंस जोन में सीमा दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल निर्धारित है।
- सार्वजनिक स्थल की सीमा पर आवाज परिवेशी मानक से 10 डेसिबल अधिक या अधिकतम 75 डेसिबल—दोनों में जो कम हो—से ज्यादा नहीं हो सकती।
- खुले स्थानों पर इस्तेमाल होने वाले ऑडियो सिस्टम में साउंड लिमिटर लगाना आवश्यक है।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम शांत वातावरण का अधिकार
लाउडस्पीकर कार्रवाई के बाद धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिकों के शांत वातावरण में रहने के अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि प्रशासन को किसी भी कार्रवाई से पहले पारदर्शी प्रक्रिया, लिखित नोटिस और सुनवाई का अवसर देना चाहिए।
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और लाउडस्पीकर के माध्यम से निर्धारित सीमा से अधिक आवाज करने को धार्मिक अधिकार नहीं माना जा सकता। प्रशासन का कहना है कि नियम सभी धर्मों और आयोजनों पर समान रूप से लागू किए जाएंगे।
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