उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के न्यायालय-आदेशित सर्वे के दौरान हुई हिंसा अचानक भड़की घटना नहीं, बल्कि कथित रूप से पहले से रची गई एक सुनियोजित साजिश थी। हिंसा की जाँच के लिए गठित तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने बुधवार, 5 अगस्त 2026 को आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश की। रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के संभल सांसद जियाउर्रहमान बर्क और सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल सहित कई लोगों की कथित भूमिका का उल्लेख किया गया है। आयोग ने कहा कि मस्जिद सर्वे को लेकर गलत सूचनाएँ और भ्रामक संदेश फैलाकर लोगों को उकसाया गया।
सर्वे से पहले तैयार की गई हिंसा की जमीन: रिपोर्ट
आयोग के अनुसार, संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े मुकदमे में सिविल जज सीनियर डिवीजन ने 19 नवंबर 2024 को सर्वे का आदेश दिया था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस आदेश के बाद मस्जिद और आसपास के क्षेत्रों में असंतोष बढ़ाने तथा मुस्लिम समुदाय के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश की गई।
कथित रूप से यह प्रचार किया गया कि सर्वे के बहाने मस्जिद को नुकसान पहुँचाया जाएगा या उस पर कब्जा करने का प्रयास हो रहा है। आयोग का निष्कर्ष है कि ऐसी अफवाहों और भ्रामक संदेशों ने 24 नवंबर की हिंसा के लिए जमीन तैयार की।
रिपोर्ट में सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क, सुहैल इकबाल, जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष जफर अली, अधिवक्ता कासिम जमाल, कमेटी के सचिव मशहूद अली फारूकी, उपाध्यक्ष लहदन खान और कुछ अन्य सदस्यों का नाम कथित रूप से हिंसा के लिए लोगों को उकसाने वालों में शामिल किया गया है।
राजनीतिक वर्चस्व और भ्रामक प्रचार का दावा
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल ने स्थानीय स्तर पर अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने और सरकार तथा पुलिस-प्रशासन को बदनाम करने के उद्देश्य से लोगों को कथित रूप से भड़काया।
रिपोर्ट में संभल के स्थानीय तुर्क और पठान मुस्लिम गुटों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की प्रतिद्वंद्विता को भी तनाव बढ़ने के कारणों में शामिल बताया गया है। आयोग के अनुसार, स्थानीय राजनीति, मस्जिद सर्वे को लेकर फैलाई गई गलत जानकारी और सोशल मीडिया पर प्रसारित भड़काऊ संदेशों ने मिलकर तनावपूर्ण माहौल बनाया।
हालाँकि, रिपोर्ट में लगाए गए ये आरोप न्यायिक आयोग के निष्कर्ष हैं। संबंधित व्यक्तियों की अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।
24 नवंबर को कैसे भड़की थी हिंसा?
24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था। इसी दौरान मस्जिद और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए। कुछ ही समय बाद नारेबाजी और पथराव शुरू हो गया तथा स्थिति हिंसक हो गई।
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भीड़ ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर कथित रूप से पथराव तथा फायरिंग की। उपद्रवियों ने पुलिस के हथियार और दंगा नियंत्रण सामग्री छीनने का प्रयास किया। कई वाहनों और संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया।
हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और 28 पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी घायल हुए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्थानीय उपद्रवियों के साथ कुछ बाहरी लोग भी हिंसा में शामिल थे।
पुलिस की गोली से मौत नहीं होने का दावा
न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हिंसा में मारे गए लोगों को लगी गोलियाँ पुलिस के हथियारों से नहीं चली थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, पोस्टमॉर्टम और बैलिस्टिक जाँच में मृतकों को लगी चोटें कथित रूप से .315 बोर के हथियारों से होने की संभावना सामने आई।
आयोग ने कहा कि घटनास्थल पर मौजूद किसी पुलिसकर्मी के पास .315 बोर का हथियार होने का प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं मिला। रिपोर्ट में सात पुलिसकर्मियों को भी भीड़ की कथित गोलीबारी में गोली लगने का उल्लेख किया गया है।
आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि मृतकों के परिजनों द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में अज्ञात लोगों को आरोपित किया गया था और उनके शुरुआती बयानों में पुलिस पर हत्या का सीधा आरोप नहीं लगाया गया था।
मृतकों की पहचान
हिंसा में चार लोगों की मौत का उल्लेख आयोग की रिपोर्ट में किया गया है। इनमें कोट कुर्वी क्षेत्र के नईम, सरायतरीन निवासी बिलाल, हयात नगर निवासी नुमान और एक 19 वर्षीय युवक शामिल थे।
आयोग के अनुसार, फॉरेंसिक जाँच, बैलिस्टिक रिपोर्ट और घटनास्थल के पुनर्निर्माण से यह संकेत मिला कि इनकी मौत पुलिस फायरिंग से नहीं हुई थी। रिपोर्ट ने मौतों के लिए हिंसा की कथित साजिश और भीड़ के बीच हुई गोलीबारी को जिम्मेदार ठहराया है।
भड़काऊ वीडियो और संदेशों से भीड़ जुटाने का आरोप
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे से पहले और हिंसा वाले दिन कुछ लोगों ने वीडियो तथा संदेशों के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को भड़काने का प्रयास किया।
कथित संदेशों में यह दावा किया गया कि सर्वे के बहाने मस्जिद को हड़पने या नुकसान पहुँचाने की योजना बनाई जा रही है। आयोग ने मस्जिद परिसर और आसपास कथित रूप से दिए गए भड़काऊ भाषणों, नारेबाजी, पथराव, आगजनी और गोलीबारी के घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख किया है।
बर्क और सुहैल इकबाल पर एफआईआर में भी लगे थे आरोप
संभल हिंसा के बाद दर्ज एफआईआर में भी सांसद जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल का नाम शामिल किया गया था।
एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि बर्क 22 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद गए थे और नमाज के बाद प्रशासनिक अनुमति के बिना भीड़ एकत्र कर कथित रूप से भड़काऊ बयान दिए थे।
सुहैल इकबाल पर आरोप था कि वह 24 नवंबर को हिंसा के दौरान भीड़ के बीच मौजूद थे और उन्होंने कथित रूप से लोगों को यह कहते हुए उकसाया कि राजनीतिक नेतृत्व उनके साथ है। आयोग की रिपोर्ट ने भी दोनों की कथित भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
पुलिस और जिला प्रशासन की कार्रवाई की सराहना
न्यायिक आयोग ने हिंसा को नियंत्रित करने में संभल पुलिस और जिला प्रशासन की भूमिका की सराहना की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के घायल होने के बावजूद प्रशासन ने तत्परता से कार्रवाई की और हिंसा को दूसरे क्षेत्रों में फैलने से रोका।
आयोग के अनुसार, पुलिस ने गंभीर उकसावे और हमलों के बावजूद संयमित तरीके से स्थिति को नियंत्रित किया। रिपोर्ट में प्रशासन की कार्रवाई को प्रभावी बताते हुए कहा गया कि समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाता तो हिंसा का दायरा और बड़ा हो सकता था।
28 नवंबर 2024 को गठित हुआ था आयोग
उत्तर प्रदेश सरकार ने 28 नवंबर 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग गठित किया था।
आयोग में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अमित मोहन प्रसाद और पूर्व पुलिस महानिदेशक अरविंद कुमार जैन भी शामिल थे। आयोग को हिंसा के कारणों, घटना के पूर्व नियोजित होने की संभावना, पुलिस-प्रशासन की भूमिका और भविष्य में ऐसी घटनाएँ रोकने के उपायों की जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी।
कौन हैं जियाउर्रहमान बर्क?
जियाउर्रहमान बर्क समाजवादी पार्टी के नेता और संभल लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। उनके दादा शफीकुर्रहमान बर्क भी संभल से सांसद रह चुके थे।
जियाउर्रहमान बर्क इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुंदरकी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। राजनीति में आने से पहले वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े रहे। उन्होंने कानून और कला विषय में स्नातक की पढ़ाई की है।
संभल हिंसा की एफआईआर में उन पर भीड़ को उकसाने के आरोप लगाए गए थे। हालाँकि, किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दोषी ठहराने का अंतिम अधिकार अदालत का है।
रिपोर्ट के बाद बढ़ सकती है राजनीतिक और कानूनी हलचल
विधानसभा में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट पेश होने के बाद संभल हिंसा को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है। रिपोर्ट के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई पर विचार कर सकती है।
आयोग ने 24 नवंबर 2024 की घटना को अचानक हुआ टकराव मानने के बजाय पहले से रची गई कथित साजिश, भ्रामक प्रचार और सुनियोजित उकसावे से जोड़ा है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार रिपोर्ट की सिफारिशों पर क्या कदम उठाती है और रिपोर्ट में नामित लोगों की ओर से इन आरोपों पर क्या जवाब दिया जाता है।
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