रांची के खादगढ़ा बस स्टैंड के पास एक ऐसी बस्ती बसी है, जहां रहने वाले लोगों के लिए सूरज का उगना और ढलना कोई दृश्य अनुभव नहीं है। यहां सुबह और रात की पहचान हवा की बदलती छुअन, वाहनों के शोर, आसपास की आहट और सन्नाटे से होती है। इस बस्ती में रहने वाले अधिकतर लोग दृष्टिबाधित हैं और अपनी दुनिया को आंखों से नहीं, बल्कि स्पर्श, आवाज और आपसी विश्वास के सहारे महसूस करते हैं।
स्थानीय लोगों के बीच यह इलाका रांची की ‘ब्लाइंड बस्ती’ के नाम से जाना जाता है। इसकी हर गली और हर घर दृष्टिबाधित परिवारों के संघर्ष, आत्मसम्मान, बेबसी और आपसी भाईचारे की कहानी बयां करता है।
1999 में दृष्टिबाधित सहपाठियों ने बसाई थी बस्ती
ब्लाइंड बस्ती की शुरुआत वर्ष 1999 के आसपास हुई थी। उस समय अलग झारखंड राज्य के गठन को लेकर आंदोलन तेज था। रांची के एक ब्लाइंड स्कूल में पढ़ने वाले कुछ दृष्टिबाधित सहपाठियों ने एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ निभाने का संकल्प लिया और मिलकर इस बस्ती की नींव रखी।
बस्ती में रहने वाले लोगों के अनुसार, ब्लाइंड स्कूल के पूर्व छात्र बिरसा धान और बालेश्वर कुजूर ने इसे बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। धीरे-धीरे झारखंड के अलग-अलग जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी दृष्टिबाधित लोग यहां आकर रहने लगे। सभी ने एक-दूसरे का सहारा बनते हुए इस स्थान को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया।
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गांव लौटने पर असहज सवालों का सामना
बस्ती में रहने वाली अलका केरकेट्टा बताती हैं कि अब वह अपने गांव वापस नहीं जाना चाहतीं। उनका कहना है कि गांव जाने पर लोग उनकी दृष्टिबाधितता को लेकर कई असहज और अजीब सवाल पूछते हैं। इस कारण उन्हें मानसिक परेशानी और असहजता महसूस होती है।
अलका के मुताबिक, इस बस्ती में उन्हें अपने जैसे लोगों का साथ, सम्मान और अपनापन मिलता है। यहां कोई उनकी कमजोरी को लेकर सवाल नहीं करता, बल्कि सभी एक-दूसरे की जरूरतों और परेशानियों को समझते हैं।
एक हजार रुपये पेंशन, लेकिन कई योजनाओं से वंचित
अलका केरकेट्टा को विकलांगता पेंशन योजना के तहत हर महीने एक हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है। हालांकि उनका कहना है कि उन्हें राज्य सरकार की मंईयां सम्मान योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
अलका के अनुसार, मंईयां सम्मान योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की सहायता दी जाती है, लेकिन वह इस योजना से वंचित हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें दूसरी सरकारी योजनाओं का भी लाभ मिले, तो परिवार की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है।
पांच किलो अनाज पर्याप्त नहीं
अलका के पति जॉर्ज सुरीन बताते हैं कि दृष्टिबाधित होना केवल देखने की क्षमता खो देना नहीं है। इसके साथ सामाजिक भेदभाव, बेरोजगारी, गरीबी और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े कई संघर्ष भी जुड़ जाते हैं।
सरकार की ओर से दृष्टिबाधित परिवारों को हर महीने पांच किलो अनाज उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन परिवारों का कहना है कि यह उनकी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। बस्ती में अब भी पक्का मकान, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है।
दृष्टिबाधित दंपतियों के बच्चे पूरी तरह स्वस्थ
इस बस्ती में पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से रह रहे कई दृष्टिबाधित युवक-युवतियों ने आपस में शादी की है। उनके बच्चे अब बड़े हो चुके हैं। सबसे सुखद पहलू यह है कि इन दृष्टिबाधित दंपतियों के अधिकतर बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपनी आंखों से दुनिया देखने में सक्षम हैं।
हालांकि माता-पिता की आर्थिक परेशानियों का असर बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर भी पड़ता है। सीमित आय और रोजगार के अभाव के कारण कई बच्चों को बेहतर शिक्षा तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में परिवारों को कठिनाई होती है।
बस्ती में रहने वाले कुछ दृष्टिबाधित दंपति अब दादा-दादी और नाना-नानी भी बन चुके हैं, लेकिन उनका जीवन स्तर आज भी बेहद खराब है। कई परिवारों की स्थिति सामान्य बीपीएल परिवारों से भी कमजोर बताई जाती है।
अलग-अलग जिलों से आए लोग बने एक परिवार
ब्लाइंड बस्ती में रहने वाले लोग झारखंड के विभिन्न जिलों और दूसरे राज्यों से आए हैं। इसके बावजूद उनके बीच गहरा भावनात्मक संबंध है। उनका कहना है कि यहां रहने वाले सभी लोगों को ऐसा महसूस होता है जैसे उनका रिश्ता वर्षों नहीं, बल्कि सदियों पुराना हो।
यहां के लोग एक-दूसरे को रास्ता दिखाने, राशन लाने, बच्चों की देखभाल करने और बीमारी के समय मदद करने में पीछे नहीं हटते। यही आपसी सहयोग इस बस्ती की सबसे बड़ी ताकत है।
नौकरी नहीं मिली तो भीख मांगने की मजबूरी
बस्ती में रहने वाले कई पुरुष और महिलाएं दसवीं कक्षा तक पढ़े हैं। कुछ युवकों ने दिल्ली जाकर दृष्टिबाधित विद्यालयों से बारहवीं की पढ़ाई भी पूरी की है। इसके बावजूद उन्हें रोजगार नहीं मिल सका।
नौकरी और स्वरोजगार के अवसर नहीं मिलने के कारण कई लोगों को जीविका चलाने के लिए चर्च, मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थलों के बाहर जाकर आर्थिक मदद मांगनी पड़ती है। वे सुबह घर का काम पूरा करने के बाद आसपास के धार्मिक स्थलों पर चले जाते हैं, जहां लोगों से उन्हें कुछ रुपये मिल जाते हैं।
डिजिटल भुगतान से आमदनी पर असर
बस्ती के लोगों का कहना है कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के बाद उनकी आमदनी पर भी असर पड़ा है। पहले लोग जेब में नकद रुपये रखते थे और जरूरतमंदों को कुछ सहायता दे देते थे, लेकिन अब बहुत से लोग नकद पैसा लेकर नहीं चलते।
कई दिन ऐसे गुजरते हैं, जब पूरे दिन में 50 रुपये जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में परिवार के भोजन, बच्चों की पढ़ाई, दवा और अन्य जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन हो जाता है।
बस स्टैंड बनने के दौरान हुआ था विस्थापन
स्थानीय लोगों के अनुसार, ब्लाइंड बस्ती की स्थापना करीब 27 से 28 वर्ष पहले हुई थी। बाद में खादगढ़ा बस स्टैंड के निर्माण और विकास कार्यों के कारण उन्हें पहले वाले स्थान से विस्थापित होकर सीमित जगह में बसना पड़ा।
आज इस छोटी सी जगह में कई परिवार रह रहे हैं। जगह की कमी के कारण घर बेहद छोटे हैं और बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।
बस्ती उजड़ने का डर
ब्लाइंड बस्ती में रहने वाले परिवारों की सबसे बड़ी चिंता दोबारा विस्थापन को लेकर है। जॉर्ज और अलका का कहना है कि नगर निगम की ओर से उन्हें कई बार जगह खाली करने का नोटिस दिया जा चुका है।
हालांकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हुए आश्वासन दिया है कि जब तक बस्ती के परिवारों को किसी दूसरी जगह पुनर्वासित नहीं किया जाता, तब तक उन्हें हटाया नहीं जाएगा।
इसके बावजूद लोगों के मन में हर समय बस्ती उजड़ने का डर बना रहता है। उनका कहना है कि वे विकास कार्यों का विरोध नहीं करते, लेकिन प्रशासन को उन्हें हटाने से पहले सम्मानजनक पुनर्वास, पक्के मकान, पेयजल, शौचालय और रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए।
सरकार से रोजगार और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग
ब्लाइंड बस्ती के परिवारों की मांग है कि सरकार उनके लिए विशेष रोजगार अभियान चलाए। शिक्षित दृष्टिबाधित युवक-युवतियों को सरकारी और निजी क्षेत्रों में नौकरी दी जाए तथा स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
इसके साथ ही सभी पात्र परिवारों को विकलांगता पेंशन, आवास योजना, राशन, स्वास्थ्य बीमा और महिला कल्याण योजनाओं से जोड़ा जाए। बस्ती के लोग चाहते हैं कि उन्हें दया का पात्र नहीं, बल्कि समान अधिकार वाले नागरिक के रूप में देखा जाए।
रांची की यह ब्लाइंड बस्ती केवल अभाव और संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है, जिन्होंने अंधेरे के बीच आपसी विश्वास, प्रेम और भाईचारे की रोशनी से अपनी एक अलग दुनिया बसाई है।
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