बिहार चुनाव 2025 में SIR का क्या होगा असर?
जब 85 सीटों पर 10 हजार वोट से भी कम का अंतर तय करे हार-जीत, तो वोटर लिस्ट का हर बदलाव बड़ा मायने रखता है।
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। चुनाव आयोग का दावा है कि 99% वोटर लिस्ट का रिवीजन पूरा हो चुका है, लेकिन लगभग 61 लाख नाम या तो मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अज्ञात पाए गए हैं, जिससे राजनीतिक दलों में हलचल है। इस मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है, और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव तो चुनाव बहिष्कार तक की चेतावनी दे चुके हैं।
क्यों अहम है SIR का असर?
2020 के विधानसभा चुनाव में यह बात सामने आई कि:
- 85 सीटों पर जीत-हार का अंतर 10 हजार से कम था
- 11 सीटों पर अंतर 1,000 वोट से भी कम
- 153 सीटों पर अंतर 20 हजार से कम रहा
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मतदाता सूची में मामूली बदलाव भी इन सीटों पर सीधा चुनाव परिणाम बदल सकता है।
कौन किसे हरा सका इतने कम अंतर से?
| सीट | अंतर | विजेता दल | पराजित दल |
|---|---|---|---|
| हिलसा | 12 वोट | जेडीयू | राजद |
| बरबीघा | 113 वोट | जेडीयू | कांग्रेस |
| भोरे | 462 वोट | जेडीयू | सीपीआई(एमएल) |
| बछवारा | 464 वोट | भाजपा | सीपीआई |
| चकाई | 581 वोट | निर्दलीय | राजद |
| परबत्ता | 951 वोट | जेडीयू | राजद |
| रामगढ़ | 189 वोट | राजद | बसपा |
इनमें से कई सीटों पर NOTA पर भी हजारों वोट पड़े, जो परिणाम को पलट सकते थे।
61 लाख नाम हटने की संभावित सियासी गूंज:
- 21.6 लाख वोटर मृत घोषित
- 31.5 लाख स्थायी रूप से बाहर गए
- 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगह दर्ज
- 1 लाख का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला
मतलब: यदि इन मतदाताओं का बड़ा हिस्सा किसी विशेष जाति, वर्ग या दल का समर्थक रहा है, तो सीटों पर समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
2020 में इन करीबी सीटों पर कौन किसके पक्ष में रहा?
- महागठबंधन को 41 सीटें मिलीं (आरजेडी-28, कांग्रेस-10, वाम दल-2, AIMIM-1)
- एनडीए को 44 सीटें (भाजपा-17,जेडीयू-20, लोजपा-1, हम-3, वीआईपी-2, निर्दलीय-1)
इसका मतलब है कि SIR से महज कुछ हजार वोटों की हलचल किसी भी गठबंधन की जीत या हार तय कर सकती है।
बिहार चुनाव 2025 में SIR केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राजनीतिक टर्निंग पॉइंट बन सकता है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब है कि सभी दलों को अपने कोर वोट बैंक की स्थिति फिर से आंकनी होगी। साथ ही, पारदर्शिता की कमी पर संदेह गहराएगा, जो चुनाव की वैधता और निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर सकता है।