मोहन भागवत का बयान और उसका संदेश
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत अक्सर अपने बयानों से चर्चा में रहते हैं। संघ के 100 साल पूरे होने के मौके पर उन्होंने संगठन और उसकी सोच को लेकर एक बड़ा संदेश दिया। भागवत ने कहा कि लोग आरएसएस को अटकलों या सुनी-सुनाई बातों पर नहीं, बल्कि सच्चाई और तथ्यों के आधार पर समझें। उनका कहना था कि संघ का असली मकसद भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाना है और इसके 100 वर्षों की यात्रा का सार केवल एक वाक्य में है— “भारत माता की जय”। यह नारा मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि पूरे देश को एकजुट करने का संकल्प है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यानमाला का प्रथम दिवस। #संघयात्रा https://t.co/VfMkieYF2X
— RSS (@RSSorg) August 26, 2025
हिंदू राष्ट्र की नई परिभाषा
भागवत ने हिंदू की एक उदार परिभाषा पेश करते हुए कहा कि हिंदू वही है जो अपने रास्ते पर चलता है और साथ ही दूसरों की आस्थाओं और विचारों का भी सम्मान करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करता है, तो इसका मतलब किसी का विरोध करना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है। उनका संदेश था कि अगर कोई खुद को हिंदू नहीं मानता, तब भी वह हमारे अपने ही हैं। यानी संघ का लक्ष्य समाज को जोड़ना है, न कि बाँटना।
विविधता में एकता की ताकत
उन्होंने कहा कि भारत की असली शक्ति इसकी विविधता में है। अलग-अलग मत और विचारों के बावजूद सबको साथ लेकर चलना ही संघ की सोच है। यही सोच देश को एकजुट करेगी और भारत को फिर से ऊँचाई तक ले जाएगी।
भारत को विश्वगुरु बनाने का उद्देश्य
भागवत ने अपने भाषण में कहा कि संघ का असली मकसद भारत को ताकतवर बनाना है, ताकि दुनिया में उसका योगदान और पहचान स्थापित हो सके। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि हर देश की एक भूमिका होती है और अब समय आ गया है कि भारत अपनी आवाज़ और योगदान से दुनिया को दिशा दे।
क्रांतिकारियों और कांग्रेस पर विचार
भागवत ने आज़ादी की लड़ाई को याद करते हुए कहा कि उस दौर में क्रांतिकारियों का जबरदस्त जोश था। सावरकर जैसे लोग प्रेरणा का स्रोत थे, लेकिन आज़ादी मिलने के बाद वही जोश धीरे-धीरे कम हो गया। उन्होंने कांग्रेस आंदोलन का भी जिक्र किया और कहा कि आज़ादी तो मिल गई, लेकिन अगर आज़ादी के बाद भी वही भावना कायम रहती, तो शायद देश की तस्वीर कुछ और होती। उन्होंने साफ किया कि उनका उद्देश्य किसी पर दोषारोपण करना नहीं है, बल्कि इतिहास की सच्चाई को सामने रखना है।
जिम्मेदारी सबकी है, सिर्फ नेताओं की नहीं
मोहन भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही— देश को सुधारने या बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ किसी नेता, संगठन या एक व्यक्ति की नहीं है। यह सोचना कि कोई आएगा और सब बदल देगा, गलत है। उन्होंने कहा कि “राम या शिवाजी कब तक आएँगे? अब हमें खुद ही राम या शिव बनना होगा।” उनका मतलब था कि हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।