असम 10 दिसंबर को ‘बलिदान/शहीद दिवस’ (Swahid Divas) के रूप में याद करता है। यह वह दिन है जब 1979 में 22 वर्षीय युवा खरगेश्वर तालुकदार ने अपनी मिट्टी और पहचान की रक्षा करते हुए प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था। वे उन 850 से अधिक लोगों में पहले शहीद थे, जो बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ असम आंदोलन के दौरान मारे गए। उन्हें बेरहमी से हमला कर मार डाला गया और शव को सड़क किनारे खाई में फेंक दिया गया था।
पीएम मोदी और सीएम हिमंता ने दी श्रद्धांजलि
इस 46वें शहीद दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम आंदोलन में शहादत देने वालों के साहस को याद करते हुए कहा कि यह आंदोलन भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने असम की संस्कृति को मजबूत करने और राज्य के समग्र विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी खरगेश्वर तालुकदार और अन्य 850 शहीदों को नमन किया। उन्होंने स्वाहिद स्मारक का उद्घाटन कर कहा कि मातृभूमि के लिए इनका बलिदान हमेशा प्रेरणा बना रहेगा।
Today, on Swahid Diwas, we recall the valour of all those who were a part of the Assam Movement. The Movement will always have a prime place in our history. We reiterate our commitment to fulfilling the dreams of those who participated in the Assam Movement, notably the…
— Narendra Modi (@narendramodi) December 10, 2025
असम में क्रांति की शुरुआत
1970–80 के दशक में बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण असम में असंतोष की आग भड़क उठी थी। अपनी जमीन, भाषा और सांस्कृतिक पहचान खोने के डर ने लोगों को संगठित कर दिया था। इसी माहौल में AASU (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) के युवा नेता खरगेश्वर तालुकदार की निर्मम हत्या हुई, जिसने पूरे प्रदेश में प्रतिरोध की लहर पैदा कर दी।
उनकी हत्या कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि एक चेतावनी की तरह थी, जिसने आंदोलन को जन-जन का संघर्ष बना दिया। AASU और AAGSP के नेतृत्व में छात्र, किसान, बुद्धिजीवी और आम लोग एकजुट हुए।
असम आंदोलन का प्रभाव और राजनीतिक उथल-पुथल
खरगेश्वर की शहादत के बाद आंदोलन तेज हो गया। असम की असमी पहचान खतरे में दिखने लगी थी।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि तत्कालीन असम सरकार असंतोष काबू करने में विफल रही, और असमवासियों का भरोसा सरकार से उठ गया। अंततः 12 दिसंबर 1979 को केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।
1983 चुनाव बहिष्कार और नेल्ली नरसंहार
नागरिकता मुद्दे का समाधान किए बिना चुनाव कराने के केंद्र के फैसले का आंदोलनकारियों ने कड़ा विरोध किया। पूरे राज्य में व्यापक चुनाव बहिष्कार हुआ।
इसके बाद 1983 में नेल्ली नरसंहार घटित हुआ—असम की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक।
हजारों हिंसक घटनाएँ, लाखों बेघर लोग, जलाए गए घर और बिखरी ज़िंदगियाँ… यह सब बताते हैं कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी थी।
इन सबके बीच भी असम की जनता का हौसला नहीं टूटा। हर प्रदर्शन में लोगों के मन में खरगेश्वर तालुकदार की याद जीवित रही।
ऐतिहासिक ‘असम समझौता’ — संघर्ष की जीत
लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार, AASU और AAGSP के बीच ऐतिहासिक असम समझौता (Assam Accord) हुआ। इसमें स्पष्ट रूप से तय किया गया:
- 1 जनवरी 1966 से पहले आने वाले लोग नागरिक माने जाएँगे।
- 1966–24 मार्च 1971 के बीच आने वालों को 10 वर्षों तक राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेंगे, लेकिन वे रह सकेंगे।
- 24 मार्च 1971 के बाद आने वाले अवैध घुसपैठिए माने जाएँगे और उन्हें निष्कासित किया जाएगा।
इस समझौते ने असम की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की रक्षा के लिए ठोस कदमों का आश्वासन दिया।
शहीद दिवस का महत्व और अधूरे वादे
असम का शहीद दिवस केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है। यह उन हजारों लोगों की याद है जिन्होंने अपनी पहचान, संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए प्राण न्यौछावर किए।
लेकिन आंदोलन के कई वादे आज भी अधूरे हैं—
बांग्लादेशी घुसपैठ अब भी चिंता का विषय है, “असम समझौते” के कई प्रावधान पूर्ण रूप से लागू नहीं हुए हैं, और पहचान की लड़ाई जारी है।
इसलिए शहीद दिवस हमें याद दिलाता है कि असम की विरासत—उसकी मिट्टी, भाषा और संस्कृति—सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान की भी ज़िम्मेदारी है। यह वह अमूल्य धरोहर है जिसे बचाने के लिए कई युवा, जैसे खरगेश्वर तालुकदार, हमेशा के लिए इतिहास में अमर हो गए।
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