पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार का महिला विरोधी रुख एक बार फिर चर्चा में है। अपनी जायज़ माँगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही हजारों आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं के खिलाफ सरकार ने पुलिस बल का इस्तेमाल किया। बुधवार (21 जनवरी 2026) को ₹15,000 न्यूनतम वेतन और बीमा सुविधा की माँग को लेकर जब ये महिलाएँ ‘स्वास्थ्य भवन’ की ओर बढ़ीं, तो पुलिस ने उन्हें अपराधियों की तरह हिरासत में लेना शुरू कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम पर सबसे ज़्यादा सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि राज्य की मुख्यमंत्री खुद एक महिला हैं और गृह मंत्रालय भी उन्हीं के पास है। इसके बावजूद उन्होंने प्रदर्शनकारी महिलाओं से संवाद करने के बजाय उन्हें रास्ते में ही रोकने का फैसला किया। सियालदह और हावड़ा रेलवे स्टेशनों को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया, ताकि दूर-दराज से आ रही आशा कार्यकर्ता सरकार तक अपनी आवाज न पहुँचा सकें।
पश्चिम बंगाल में आशा कार्यकर्ताओं का बड़ा प्रदर्शन!
"नारी होकर नारी का अपमान किसने किया? मुख्यमंत्री खुद!"
– यह जोरदार नारा आशा वर्कर्स ने लगाया, जो पूरे राज्य की महिलाओं के बीच गूंज रहा है।
न्यायोचित मांगों से बचने के लिए राज्य की स्वास्थ्य मंत्री, जो खुद मुख्यमंत्री और… pic.twitter.com/pfaLsxGgfC
— One India News (@oneindianewscom) January 21, 2026
हैरत की बात यह भी रही कि महिलाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए बड़ी संख्या में पुरुष पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। इसे संवैधानिक मूल्यों और नैतिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया जा रहा है। गुस्से में प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने नारे लगाए—“महिला होकर महिलाओं का अपमान किसने किया? खुद मुख्यमंत्री ने!”
गौरतलब है कि आशा कार्यकर्ता पिछले साल 23 दिसंबर 2025 से हड़ताल पर हैं, लेकिन सरकार की ओर से अब तक बातचीत की कोई ठोस पहल नहीं की गई। कई जिलों से आई कार्यकर्ताओं को रात से ही हिरासत में लिया जाने लगा, जिससे सरकार की सख्ती और असहिष्णु रवैये के आरोप और गहरे हो गए हैं।
प्रोत्साहन राशि के बजाय सम्मानजनक वेतन और सामाजिक सुरक्षा की माँग कर रही आशा कार्यकर्ताओं ने साफ कहा है कि पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियाँ उनके हौसले नहीं तोड़ सकतीं। उनका कहना है कि जब तक उनकी माँगें नहीं मानी जातीं, उनका आंदोलन जारी रहेगा।
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