चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने भारत-चीन संबंधों और 1954 के पंचशील समझौते को लेकर बड़ा बयान दिया है। देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने उस समय पंचशील समझौते को उत्तरी सीमा विवाद के समाधान की दिशा में अहम कदम माना था, लेकिन चीन ने इसे केवल व्यापारिक समझौते के रूप में देखा। यही कारण है कि आज भी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) संवेदनशील बनी हुई है।
पंचशील समझौता और ऐतिहासिक संदर्भ
जनरल चौहान ने बताया कि 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रीमियर झोउ एनलाई के बीच पंचशील समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था और पाँच सिद्धांतों पर आधारित शांति और आपसी सम्मान की नीति अपनाई गई थी।
#WATCH | Dehradun, Uttarakhand: Chief of Defence Staff General Anil Chauhan says, "On independence, the British left, and it was for India actually to decide where a front is. Nehru probably knew that we had something, as the McMahon Line was in the east, and we had some kind of… pic.twitter.com/l5aMknInoF
— ANI (@ANI) February 13, 2026
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन के बाद कई क्षेत्रों में सीमाएं स्पष्ट नहीं थीं। पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा जैसी व्यवस्था थी और लद्दाख के कुछ हिस्सों पर भारत का दावा था, लेकिन पहाड़ी इलाकों में सीमा निर्धारण अस्पष्ट रहा, जिसके चलते पंचशील जैसे समझौते का रास्ता चुना गया।
चीन की अलग सोच और LAC की संवेदनशीलता
CDS ने कहा कि 1950 के दशक में चीन आज जितना मजबूत नहीं था और तिब्बत पर कब्जे के बाद वह क्षेत्र में स्थिरता चाहता था। भारत भी उस समय चीन के साथ मजबूत संबंध बनाना चाहता था, लेकिन दोनों देशों की रणनीतिक सोच अलग-अलग थी। इसी अंतर के कारण सीमा विवाद पूरी तरह सुलझ नहीं पाया और आज भी LAC पर संवेदनशीलता बनी हुई है।
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