पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का आधिकारिक ऐलान भले अभी न हुआ हो, लेकिन राज्य की सियासत तेजी से गरमा रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन की संभावना खत्म होने के बाद कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक के बाद यह रणनीति तय हुई। पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है, जिससे बंगाल में टीएमसी, बीजेपी, कांग्रेस और लेफ्ट के बीच सीधा बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल कांग्रेस प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने बताया कि प्रदेश नेतृत्व के साथ विस्तृत चर्चा के बाद सामूहिक रूप से अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया गया। दरअसल, कांग्रेस की टीएमसी के साथ गठबंधन की बातचीत चल रही थी, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर सहमति नहीं बन सकी। सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी की ओर से कांग्रेस को सीमित सीटों का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे पार्टी ने स्वीकार नहीं किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी कांग्रेस को ज्यादा राजनीतिक स्पेस देने के मूड में नहीं हैं, क्योंकि दोनों दलों का वोट बैंक काफी हद तक समान रहा है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कमजोर संगठन और घटते जनाधार के बीच वह बंगाल में कितना प्रभाव छोड़ पाएगी। पार्टी के अंदरूनी आकलन के अनुसार कांग्रेस करीब 65 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है और 5 से 7 सीटों पर जीत का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, पिछले चुनावी प्रदर्शन को देखते हुए चुनौती बड़ी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा।
इस बार कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ भी गठबंधन नहीं किया है। माना जा रहा है कि बंगाल और केरल में एक साथ होने वाले चुनाव और राजनीतिक समीकरण इसके पीछे बड़ी वजह हैं। कांग्रेस नेता सुदीप रॉय बर्मन ने कहा कि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया गया है, क्योंकि पिछले गठबंधनों से पार्टी को कोई खास फायदा नहीं हुआ।
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो बंगाल में मुख्य मुकाबला अब भी बीजेपी और टीएमसी के बीच ही माना जा रहा है। पिछले दो चुनावों के वोटिंग पैटर्न बताते हैं कि मतदाता मुख्य रूप से इन्हीं दो दलों के बीच बंटा है, जिसके चलते कांग्रेस और लेफ्ट हाशिये पर पहुंच गए हैं। ऐतिहासिक रूप से राज्य में मजबूत रही कांग्रेस का जनाधार लगातार घटता गया है। आजादी के बाद लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी 1977 के बाद धीरे-धीरे कमजोर होती गई और ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के उभार ने कांग्रेस की राजनीतिक जमीन और सीमित कर दी।
अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी इस बार बंगाल में पूरी ताकत से चुनाव प्रचार करेंगे या पिछली बार की तरह सीमित भूमिका में नजर आएंगे। 2021 के चुनाव में राहुल गांधी ने केवल एक रैली की थी, जबकि पार्टी नेतृत्व का ध्यान अन्य राज्यों पर ज्यादा रहा। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी के लिए बड़ा जोखिम भी साबित हो सकता है और संभावित पुनर्निर्माण का मौका भी।
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