पिछले तीन दशकों से कश्मीर की कब्रगाहें केवल शोक और मातम का स्थान नहीं रहीं, बल्कि इन्हें एक सूचना युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। पश्चिमी एनजीओ, अलगाववादी लॉबी और पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा मशीन ने लगातार यह नैरेटिव गढ़ा कि कश्मीर की अनचिह्नित कब्रें भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा किए गए सामूहिक अत्याचार का सबूत हैं।
पश्चिमी संगठनों के आरोप
2009 में आई एपीडीपी (APDP) और आईपीटीके (IPTK) की रिपोर्ट Buried Evidence में दावा किया गया था कि इन कब्रों में “जबरन गायब किए गए” लोगों के शव हैं। इसके बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसी संस्थाओं ने अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की और इशारा किया कि भारतीय सुरक्षा बल इन गुमशुदगियों के लिए जिम्मेदार हैं।
SYSF की नई रिपोर्ट और सच का खुलासा
अब सेव यूथ, सेव फ्यूचर (SYSF) फाउंडेशन की रिपोर्ट Unraveling the Truth: A Critical Study of Unmarked and Unidentified Graves in Kashmir Valley (2025) ने इन दावों को झूठा साबित कर दिया है। कई वर्षों के फील्डवर्क के बाद बारामूला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और गंदेरबल जिलों में 373 कब्रिस्तानों का सर्वे किया गया और 4,056 कब्रें दर्ज की गईं।
रिपोर्ट के मुताबिक—
- 2,493 कब्रें विदेशी आतंकियों की हैं (ज्यादातर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और एलओसी से घुसपैठ करने वाले)।
- 1,208 कब्रें स्थानीय आतंकियों की हैं (कश्मीरी युवक जिन्हें आतंकवाद में धकेला गया)।
- 70 कब्रें 1947 के कबायली हमलावरों की हैं।
- 276 कब्रें अनचिह्नित (unmarked) हैं।
इसका मतलब है कि कुल कब्रों में से 93.2% की पहचान हो चुकी है और ये ज्यादातर आतंकियों की हैं। दशकों से फैलाया जा रहा “निर्दोष नागरिकों की सामूहिक कब्रें” वाला नैरेटिव पूरी तरह गलत साबित हुआ।
प्रोपेगेंडा और पाकिस्तान की भूमिका
रिपोर्ट साफ कहती है कि ये कब्रिस्तान पाकिस्तान के प्रॉक्सी वॉर की गवाही देते हैं। 1989 के बाद आईएसआई ने अफगान जिहादी मशीनरी को कश्मीर में झोंक दिया। हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने घाटी को युद्ध का मैदान बना दिया। विदेशी आतंकी दस्तावेज़ रहित आते थे और मारे जाने पर अनजाने के तौर पर दफना दिए जाते थे।
पुरानी रिपोर्टों की खामियाँ
SYSF का कहना है कि पहले की ह्यूमन राइट्स रिपोर्टों ने स्थानीय नागरिक, आतंकी और विदेशी आतंकी—सबको एक ही श्रेणी में डाल दिया। फॉरेंसिक जांच या डीएनए टेस्टिंग ना होने की वजह से आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए और भारत को “जनसंहार करने वाला देश” दिखाया गया।
असली पीड़ितों की अनदेखी
इन रिपोर्टों ने 1989–90 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उन मुसलमानों की हत्याओं को नजरअंदाज किया जो आतंकियों का विरोध कर रहे थे। वंधामा (1998), चित्तीसिंहपोरा (2000) और नादीमार्ग (2003) जैसे नरसंहारों पर भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने लगभग चुप्पी साध ली।
जवाबदेही का फर्क: भारत बनाम पाकिस्तान
SYSF ने माना कि पठरीबल (2000), माछिल (2010) और अम्शीपोरा (2020) जैसी घटनाओं में निर्दोष लोग मारे गए। लेकिन भारत में CBI जांच हुई, दोषियों को सजा और कोर्ट-मार्शल दिया गया। इसके विपरीत पाकिस्तान में बलूचिस्तान जैसी जगहों पर सामूहिक कब्रें मिलीं, लेकिन कभी जांच आगे नहीं बढ़ाई गई।
प्रोपेगेंडा के फायदे
इन कब्रों की तस्वीरों को आतंकियों और अलगाववादियों ने प्रचार के हथियार की तरह इस्तेमाल किया। पाकिस्तान ने इन्हें UN तक ले जाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश की। पश्चिमी एनजीओ ने भी सुर्खियों के लिए इन्हें दोहराया।
वैश्विक तुलना का झूठ
पाकिस्तान और अलगाववादी लॉबी ने कश्मीर की कब्रों की तुलना बोस्निया और रवांडा के जनसंहार से की। जबकि SYSF रिपोर्ट कहती है कि कश्मीर की कब्रें सीमा-पार आतंकवाद और काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशनों का परिणाम हैं, न कि किसी “एथनिक क्लीनजिंग” का।
निष्कर्ष
SYSF की यह रिपोर्ट बताती है कि—
- 93.2% कब्रों की पहचान हो चुकी है।
- इनमें से ज्यादातर आतंकियों और घुसपैठियों की हैं।
- केवल 6.8% (276 कब्रें) अनचिह्नित हैं।
यानी ये कब्रें भारत के अत्याचार की नहीं बल्कि पाकिस्तान के जिहादी आतंकवाद की गवाही देती हैं। असल में कश्मीरियों को यह जानने का हक है कि इन कब्रिस्तानों में दफन लोग भारत के शिकार नहीं थे, बल्कि रावलपिंडी की चाल के मोहरे थे। भारतीय सुरक्षा बलों ने इस खूनी खेल को रोकने की कोशिश की, जबकि पाकिस्तान ही घाटी की दुर्दशा और इन मौतों का जिम्मेदार है।