करीब 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के जज Justice J. B. Pardiwala और Justice K. V. Viswanathan की पीठ ने दिया।
दोनों जजों ने इस बेहद संवेदनशील मामले में भावनात्मक पहलुओं के साथ-साथ कानूनी सिद्धांतों पर भी विस्तार से विचार किया और करीब 338 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया।
फैसले से पहले पुराने निर्णयों को परखा
फैसला देने से पहले सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों के महत्वपूर्ण फैसलों का भी अध्ययन किया। इनमें शामिल हैं:
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Justice Dipak Misra
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Justice D. Y. Chandrachud
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Justice A. K. Sikri
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Justice Ashok Bhushan
इन सभी जजों के फैसलों और टिप्पणियों के आधार पर कोर्ट ने एक्टिव और पैसिव इच्छामृत्यु के कानूनी फर्क को स्पष्ट किया।
एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में क्या फर्क
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि एक्टिव यूथेनेशिया और पैसिव यूथेनेशिया में मूलभूत अंतर है।
एक्टिव यूथेनेशिया
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मरीज को घातक इंजेक्शन या दवा दी जाती है
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यह एक सीधा चिकित्सीय हस्तक्षेप होता है
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इसका उद्देश्य मृत्यु को तेज करना होता है
पैसिव यूथेनेशिया
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मरीज को जीवन रक्षक उपचार या उपकरणों से हटाया जाता है
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जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब हटाना
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इसमें मृत्यु को सीधे तौर पर नहीं दिया जाता, बल्कि कृत्रिम जीवन समर्थन समाप्त किया जाता है
जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी समझाया था अंतर
पूर्व CJI Justice D. Y. Chandrachud ने अपने एक फैसले में कहा था कि:
सक्रिय इच्छामृत्यु में चिकित्सकीय हस्तक्षेप से जीवन को छोटा किया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु जीवन को उसके प्राकृतिक अंत तक पहुँचने देती है।
जस्टिस दीपक मिश्रा की अहम टिप्पणी
पूर्व CJI Justice Dipak Misra ने कहा था कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में मरीज की मौत किसी घातक बीमारी की वजह से होती है, न कि डॉक्टर की किसी सीधी कार्रवाई से।
माता-पिता के दर्द को भी माना अहम
फैसले में कोर्ट ने यह भी माना कि हरीश राणा के माता-पिता का दर्द बेहद गहरा है।
पीठ ने कहा:
इस आदेश से माता-पिता का दुख पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उनके बेटे की लंबी पीड़ा जरूर समाप्त हो जाएगी।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भावनात्मक आधार पर नहीं बल्कि मरीज के सर्वोत्तम हित और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर दिया गया है।
संवेदनशीलता और कानून का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं बल्कि संवेदनशीलता, नैतिकता और संविधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है।
यह फैसला भारत में पैसिव इच्छामृत्यु के कानूनी दायरे और मानव गरिमा के अधिकार पर भी महत्वपूर्ण दृष्टिकोण पेश करता है।
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