सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से इसे सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करने को कहा है।
बच्चे के शुरुआती साल सबसे अहम
जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि बच्चे के शुरुआती महीने और साल उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर पिता को इस दौरान बच्चे के साथ रहने का अवसर नहीं मिलता, तो यह अनुभव पिता और बच्चे दोनों के लिए छूट जाता है।
पिता की भूमिका भी उतनी ही जरूरी
अदालत ने कहा कि बच्चे के विकास में मां की भूमिका केंद्रीय होती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
पीठ ने कहा कि माता-पिता बनना एक साझा जिम्मेदारी है, जिसमें दोनों का योगदान जरूरी है।
मातृत्व अवकाश पर भी बड़ा फैसला
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने के नियम को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो।
लैंगिक समानता को मिलेगा बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व अवकाश से न केवल पिता को बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाने का मौका मिलेगा, बल्कि यह समाज में लैंगिक समानता को भी बढ़ावा देगा।
अदालत ने यह भी कहा कि इससे यह पारंपरिक सोच कमजोर होगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है।
मां के लिए भी जरूरी है पिता का सहयोग
कोर्ट ने माना कि बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में पिता का सहयोग मां के लिए बेहद जरूरी होता है।
इसलिए पितृत्व अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए, जो परिवार और बच्चे की जरूरतों के अनुरूप हो।
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