मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के तिरुनेलवेली की 1100 एकड़ जमीन पर मस्जिद के वक्फ संपत्ति के दावे को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि मस्जिद को केवल 2.34 एकड़ जमीन का ही अधिकार है, जो वर्ष 1712 में मदुरै के राजा ने दी थी। इस दावे की पुष्टि उस समय की ताँबे की प्लेट (कॉपर प्लेट) से होती है, जिसमें स्पष्ट रूप से जमीन का उल्लेख दर्ज है।
मामले की शुरुआत 2011 में हुई थी, जब मस्जिद की ओर से वक्फ ट्रिब्यूनल में यह दावा किया गया कि उसे लगभग 1100 एकड़ जमीन वक्फ संपत्ति के रूप में मिली है। 2016 में वक्फ ट्रिब्यूनल ने मस्जिद के पक्ष में फैसला भी सुना दिया था। इसके खिलाफ सरकार ने 2018 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। सरकार ने तर्क दिया कि संबंधित जमीन पहले ही रैयतवारी जमीन घोषित हो चुकी है और इसे कई गरीब किसानों में बाँट दिया गया है।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि फिलहाल 362 लोग इन जमीनों पर खेती कर रहे हैं और उनके पास वैध सरकारी पट्टे हैं। साथ ही यह जमीन 1966 में इनाम एक्ट के तहत सरकार के नाम दर्ज हो चुकी है। इसलिए मस्जिद का इतने बड़े क्षेत्र पर दावा टिकाऊ नहीं है।
अदालत ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया। पुराने रिकॉर्ड और 1925 में ट्रांसक्राइब की गई ताँबे की पट्टी से यह प्रमाणित हुआ कि मस्जिद को केवल 75 कोठा जमीन दी गई थी, जो माप में 2.34 एकड़ बनती है। कोर्ट ने माना कि उसी जमीन पर मस्जिद का हक है।
फैसले में अदालत ने कहा कि जब इतिहास प्रामाणिक दस्तावेजों से स्पष्ट होता है, तो झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे स्वीकार नहीं किए जा सकते। हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि वक्फ बोर्ड को अब उस 2.34 एकड़ जमीन की सटीक पहचान करनी होगी, जैसा कि ताँबे की पट्टी में वर्णित है।
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब 1923 से पहले सर्वे नंबर की व्यवस्था ही मौजूद नहीं थी, तो मस्जिद ने इतनी बड़ी जमीन पर दावा करने का आधार कैसे बना लिया। इस प्रकार हाई कोर्ट ने सरकार के पक्ष को सही मानते हुए मस्जिद के 1100 एकड़ जमीन के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया।