वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा आयोजित की गई। लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा की शुरुआत की, जबकि राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने सत्ता पक्ष की ओर से नेतृत्व संभाला। चर्चा के दौरान शाह ने राष्ट्रगीत के सम्मान और उससे जुड़े विवादों का उल्लेख किया, जिस पर विपक्ष ने उनसे स्पष्ट रूप से नाम बताने की माँग की।
अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि वर्षों पहले संसद में वंदे मातरम के गान को रोक दिया गया था और 1992 में भाजपा सांसद राम नाईक और लालकृष्ण आडवाणी के प्रयासों से इसे पुनः शुरू किया गया। शाह ने आरोप लगाया कि I.N.D.I गठबंधन के कई सदस्य वंदे मातरम नहीं गाते और गान शुरू होने से पहले सदन से बाहर चले जाते हैं। इस पर विपक्षी नेताओं ने सबूत पेश करने की माँग की, जिसके बाद शाह ने सदन के पटल पर दस्तावेज सौंपने का वादा किया।
चर्चा समाप्त होने के बाद शाह ने वह सूची राज्यसभा के सभापति को सौंप दी, जिसमें 2018 से 2025 तक की नौ घटनाओं का विवरण शामिल है। उन्होंने अनुरोध किया कि इन तथ्यों को राज्यसभा के आधिकारिक अभिलेखों में शामिल किया जाए। सूची में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और आरजेडी से जुड़े नौ नेताओं या घटनाओं का उल्लेख है, जिनमें विभिन्न मौकों पर वंदे मातरम गाने का विरोध या अनादर बताया गया है।

सबसे पहला नाम कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का है, जिन्होंने दिसंबर 2025 में कहा था कि वंदे मातरम की शब्दावली उनके धार्मिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाती और वे इसे नहीं गा सकते। दूसरा नाम नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का है, जिन्होंने लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि वे राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं लेकिन उसे गाना उनके लिए संभव नहीं है।
तीसरा मामला सपा के दिवंगत सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का है, जिन्होंने 2019 में शपथ लेने के बाद कहा था कि वंदे मातरम इस्लाम के खिलाफ है और वे इसका पालन नहीं कर सकते। इसके बाद सूची में उनके ही पोते और संभल से सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क का नाम आता है, जिन्होंने नवंबर 2025 में अपने दादा के रुख का समर्थन करते हुए वंदे मातरम न गाने की बात दोहराई।
2018 की एक कांग्रेस रैली का भी इस सूची में जिक्र है, जिसमें वंदे मातरम का सिर्फ एक छंद गाकर कार्यक्रम समाप्त कर दिया गया था, वह भी राहुल गांधी के आने की प्रतीक्षा में। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का 2019 का बयान शामिल है, जिसमें उन्होंने शरीयत का हवाला देते हुए वंदे मातरम बोलने से इनकार किया था।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया का 2022 का वीडियो भी सूची में है, जिसमें वे संविधान दिवस कार्यक्रम के दौरान कार्यकर्ताओं से वंदे मातरम न गाने की बात कहते दिखते हैं। शाह ने समाजवादी पार्टी के उस अभियान का भी उल्लेख किया, जिसमें उसने महाराष्ट्र के स्कूलों में वंदे मातरम अनिवार्य करने के आदेश को रद्द करने की माँग की थी।
सूची में अंतिम नाम RJD विधायक सऊद आलम का है, जो विधानसभा में वंदे मातरम के दौरान खड़े नहीं हुए थे और उन्होंने कहा था कि वे हिंदू गाना गाने या उसका सम्मान करने के लिए बाध्य नहीं हो सकते। इन नौ उदाहरणों का हवाला देते हुए शाह ने दावा किया कि वर्षों से विपक्ष के कई नेता और दल वंदे मातरम का अपमान करते रहे हैं, जबकि भाजपा के किसी सदस्य द्वारा ऐसा किए जाने का कोई उदाहरण नहीं मिलता।
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