बांग्लादेश में 15 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले महिला प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। दशकों तक देश की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाने वाली दो महिला नेता — अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की दिवंगत खालिदा जिया — के बाद अब चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम दिखाई दे रही है। कट्टरपंथी समूहों के बयान और बढ़ते उत्पीड़न के आरोपों ने महिला उम्मीदवारों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 51 राजनीतिक दलों ने कुल 1981 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिनमें मात्र 78 महिलाएँ शामिल हैं। यानी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 3.93 प्रतिशत ही है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जबकि BNP ने 10 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 78 महिला उम्मीदवारों में से कई प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों से जुड़ी हुई हैं।
जमात-ए-इस्लामी सहित कई इस्लामिक संगठनों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि महिलाएँ समाज या देश का नेतृत्व नहीं कर सकतीं। जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान और हिफाजत-ए-इस्लाम से जुड़े नेताओं ने महिला नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए शरिया कानून लागू करने की भी बात कही। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं और महिलाओं को राजनीति से दूर कर सकते हैं।
कई महिला उम्मीदवारों ने चुनाव प्रचार के दौरान ऑनलाइन ट्रोलिंग, यौन उत्पीड़न की धमकियों और चरित्र हनन जैसी समस्याओं का आरोप लगाया है। नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) की उम्मीदवार दिलशाना पारुल ने कहा कि उन्हें हिजाब पहनने को लेकर सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है। वहीं ढाका-20 से चुनाव लड़ रही नबीला तस्नीद ने आरोप लगाया कि उनके पोस्टर और बैनर फाड़े गए, लेकिन प्रशासन से पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, बांग्लादेश में आधी से ज्यादा आबादी महिलाओं की है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद कम है। रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर 1972 के तहत राजनीतिक दलों को केंद्रीय स्तर पर 33% पद महिलाओं को देने का लक्ष्य रखा गया था, जिसकी समय सीमा 2021 से बढ़ाकर 2030 कर दी गई है। बावजूद इसके अधिकांश पार्टियाँ इस लक्ष्य को हासिल करने में विफल रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि असुरक्षा, सामाजिक दबाव और कट्टरपंथी विचारधाराएँ महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित कर रही हैं।
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