भारतीय संस्कृति और संगीत प्रेमियों के लिए 8 सितंबर का दिन बेहद खास है। खासतौर पर असम के लिए, क्योंकि आज भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जयंती है। इस वर्ष से उनकी जन्मशती का आरंभ हो रहा है, जो उनके जीवन और योगदान को याद करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। भूपेन दा केवल एक गायक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी आवाज थे जो लोगों की धड़कनों में बसी हुई है।
उनके गीतों में करुणा, सामाजिक न्याय और मानवता की गहरी झलक मिलती है। असम की लोक परंपराओं, मौखिक धरोहर और सामुदायिक कहानी कहने की शैली ने उनके बचपन को गढ़ा। बहुत छोटी उम्र में ही उनकी प्रतिभा सामने आने लगी थी। पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर गाना गाया और किशोरावस्था में अपना पहला गीत रिकॉर्ड कर लिया।
असम की संस्कृति को वैश्विक पहचान देने वाले भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका को उनकी जयंती पर मेरा नमन।
भारतीय संस्कृति और संगीत जगत को उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। उनके जन्म-शताब्दी वर्ष पर पढ़िए मेरा ये आलेख…https://t.co/3h8fM3juCM
— Narendra Modi (@narendramodi) September 8, 2025
भूपेन दा संगीत के साथ-साथ एक गहरे विचारक भी थे। ज्योति प्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद रभा जैसे सांस्कृतिक हस्तियों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। कॉटन कॉलेज और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को और निखारा। बीएचयू में रहते हुए वे राजनीति शास्त्र के छात्र थे, लेकिन संगीत साधना ही उनका जीवन बन गई। काशी से उनका यह जुड़ाव आज भी हमें प्रेरित करता है।
अमेरिका प्रवास के दौरान उन्होंने कई बड़े विद्वानों और कलाकारों से संवाद किया। पॉल रोबसन से उनकी मुलाकात और उनके गीत Ol’ Man River ने भूपेन दा की कालजयी रचना बिश्टीरनो परोरे को जन्म दिया। एलेनॉर रूजवेल्ट ने भी उनके लोकसंगीत को सम्मानित किया। हालांकि उन्हें विदेश में रहने का अवसर था, पर वे भारत लौट आए और रेडियो, रंगमंच, फिल्म और डॉक्यूमेंट्री सहित हर क्षेत्र में सक्रिय हुए।
उनकी रचनाओं में हमेशा सामाजिक सरोकार झलकता था। उन्होंने गरीबों, मजदूरों, नाविकों, महिलाओं और किसानों की आवाज़ को अपने गीतों में जगह दी। उनके गीत न सिर्फ स्मृतियों में ले जाते थे बल्कि आधुनिकता के लिए दृष्टिकोण भी प्रदान करते थे। यही वजह है कि उनका संगीत आज भी समाज के वंचित तबकों को शक्ति और आशा देता है।
भूपेन दा ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को गीतों के माध्यम से साकार किया। उन्होंने असमिया, बांग्ला और हिन्दी में संगीत रचा और पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया। उनके गीत दिल हूम हूम करे और गंगा बहती है क्यों आज भी हर दिल को छूते हैं।
सिर्फ कलाकार ही नहीं, वे एक जनसेवक भी रहे। 1967 में असम के नौबोइचा से निर्दलीय विधायक चुने गए। उन्होंने राजनीति को पेशे के रूप में नहीं अपनाया, लेकिन जनता की सेवा करते रहे। उनके योगदान को देश ने पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के अवार्ड और 2019 में भारत रत्न देकर सम्मानित किया।
2011 में उनके निधन के समय लाखों लोग अंतिम यात्रा में उमड़े। उन्हें जलुकबाड़ी की पहाड़ी पर ब्रह्मपुत्र की ओर देखते हुए विदाई दी गई—वही नदी जो उनके जीवन और संगीत का प्रतीक थी। असम सरकार आज उनके नाम पर कल्चरल ट्रस्ट चला रही है ताकि युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सके।
देश के सबसे बड़े पुल का नाम भूपेन हजारिका सेतु रखना भी उनकी स्मृति को जीवित रखने का प्रतीक है। उनका जीवन हमें करुणा, संवेदनशीलता और विविधता में एकता का पाठ पढ़ाता है। उनके गीत मजदूरों, किसानों, महिलाओं और युवाओं को याद रखने और उनका सम्मान करने की प्रेरणा देते हैं।
भारत भूपेन हजारिका जैसे महान व्यक्तित्व से धन्य है। उनकी जन्मशती पर यह संकल्प लेना चाहिए कि उनके संदेश और संगीत को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और भारतीय कला-संस्कृति को समृद्ध बनाने की दिशा में एक कदम भी।
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