राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस वर्ष विजयादशमी पर अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, जो भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक नूतन पर्व है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन आरंभ से ही राष्ट्र की समष्टिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्यरत रहा है। आरंभिक 50 वर्षों तक संघ ने केवल संगठन निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया और इस काल में राष्ट्र सेविका समिति, विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, जनसंघ तथा विद्या भारती जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी। हालांकि इस दौरान संघ को 1932, 1940, 1948, 1975 और 1992 में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, परंतु प्रत्येक बार सत्याग्रह और समाज के सहयोग से संघ ने स्वयं को और अधिक मजबूत किया।
1977 के बाद के कालखंड में संघ ने सेवा कार्यों को प्राथमिकता दी। समाज के निर्धन वर्ग में कन्वर्जन की चुनौती को देखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के हजारों प्रकल्प शुरू किए गए। आज इनकी संख्या डेढ़ लाख से अधिक है, जिनमें महिला-पुरुष दोनों सक्रिय हैं। संघ का मानना है कि केवल संगठन के लिए नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन के लिए कार्य आवश्यक है। इस दिशा में पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, नागरिक कानूनों का पालन जैसे विषयों पर भी जोर दिया जा रहा है।
राजनीति में भी संघ का अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कार्यकर्ताओं को संघ की प्रेरणा से आगे लाया गया, जबकि संगठन को सर्वोपरि रखते हुए व्यक्तिगत मतभेदों को समय के साथ सुलझाया गया। संघ की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह संस्थागत अभिनिवेश से मुक्त होकर समाज के अन्य संगठनों के साथ मिलकर कार्य करता है। भाजपा या भाजपानीत सरकारों के बनने के बाद संघ से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो उसके बढ़ते प्रभाव का प्रमाण है।
आज संघ ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ से ‘परम वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ की ओर अग्रसर है। आने वाले वर्षों में ‘भारत माता की जय’ की गूंज के साथ विश्वगुरु भारत का स्वप्न साकार होने की आशा है।
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